नन्ही कोपल: आज मेरी दादी माँ का जन्मदिन है

नन्ही कोपल: आज मेरी दादी माँ का जन्मदिन है

आज मेरी दादी माँ का जन्मदिन है

           
मेरी दादी माँ के पसंदीदा फूल गुलाब उनके जन्मदिन पर 

                     मेरी दादी माँ भंडारा शहर में रहती थी मैं हर साल दीपावली मनाने अपने मम्मी पापा के साथ भंडारा शहर जाती थी वहां मेरे दादाजी और दादी माँ रहते थे
बालमन में तो कई सवाल आते है एक बार 1996 में जब दीपावली आई तो मैंने यूही अपनी दादी माँ श्रीमती शीला कोकास से पूछ लिया की दादी माँ आपका जन्मदिन कब आता है आप अपना जन्मदिन क्यों नहीं मनाती दादी माँ ने बहुत सुंदर जवाब दिया बेटा जन्मदिन तो छोटे बच्चों का मनाया जाता है हम तो बड़े हो गये है फिर भी मेरा मन नहीं माना तो फिर पूछा दादी माँ आपका जन्मदिन आता कब है दादी माँ ने बोला बेटा हमारा जन्मदिन तो पूरा देश मनाता है लोग खरीदारी करते है , अच्छे कपड़े खरीदकर पहनते है मिठाई बनाते है , सुंदर - सुंदर रंगोली डालते है ,पूजा करते है , फटाखे फोड़ते है खुशियाँ मनाते है
त्यौहार के साथ दादी माँ का जन्मदिन 
                   जी हां दीपावली का दिन मैंने जैसे ही उनका सुंदर जवाब सुना तुरंत मैंने यही कहा दादी माँ मतलब आपका जन्मदिन दीपावली के दिन आता है मतलब जिस दिन आपका जन्म हुआ था वो दीपावली का दिन था फिर मैंने पूछा तो आपके जन्म की डेट तारीख क्या थी दादी माँ ने मुस्कुराकर कहा बेटा अब तारीख याद नहीं है पर हां सन 1936 था
                  मतलब अलग से जन्मदिन मनाने की जरूरत ही नहीं दीपावली के दिन जन्मदिन ही मना ले ये बहुत खुशी की बात है की मेरे घर बड़े बुजुर्गो का जन्मदिन त्योहारों पर ही आता है और इसे सिर्फ हम और हमारा परिवार नहीं बल्कि पूरा देश त्यौहार के रूप में मनाता है मेरे दादा जी श्री जगमोहन कोकास का दशहरे के दिन और दादी माँ का जन्मदिन दीपावली के दिन आता है
            दादी माँ बहुत उत्साह से दीपावली के तैयारियां करती बहुत सारे पकवान बनाती थी (रवे की बर्फी,चूडा,सलोनी,गुजिया, कभी बेसन के लड्डू) क्योंकि हमारे घर में घर की बनी मिठाई ही चढ़ाई जाती थी पर दादा जी मैसूर पाक भी बाजार से ले आते थे वे कभी अकेले और जब मम्मी पहुँच जाती थी तब दोनों मिलकर बनाते थे , वे खुद कुछ नहीं खाती थी पर बनाती सबके लिए बहुत कुछ थी महाराष्ट की परम्परा है की दीपावली की रात को पूजा के बाद या अगले दिन पास - पड़ोस के घर में पकवान लेकर जाते है और सबसे मिलते जुलते है आज लोगो के पास वक्त की कमी है पर इस परम्परा का अपना ही एक अलग आनन्द है वे सबके घर पकवान पहुंचाती थी और आज मैं परम्परानुसार दीपावली के अगले दिन पड़ोस के सभी घरों में प्रसाद देने जाती हूँ दादी माँ को बर्फी ,कलाकंद ,पूरम पूड़ी , दूध मलाई ,मैसूर पाक बहुत पसंद थी
                 दादी माँ दीपावली के दिन गोबर से लीपकर चाक पूरकर मस्त - मस्त सुंदर रंग भरकर रंगोली डालती थी अब यहाँ तो गोबर से लीपकर डालना सम्भव नहीं हो पाता पर मैं दीपावली के दिन सुंदर डिजाइन की रंगोली डालती हूँ दादा जी पान में चमनबाहर डालते थे उसके डिब्बे और अन्य डब्बे दादी माँ मेरे लिए सम्हालकर रखती थी इनमें ही रंग रखूंगी
मैं अपने दादाजी दादी माँ के साथ 
                   दादा जी मेरे साथ मिलकर आम के पत्तो की तोरण बनाते थे और मुख्य द्वार पर तोरण बांधते थे पूजा के समय नए सिक्के रखना ,लाइ बताशा रखना , फल रखना पीतल के लोटे में आम की पत्तियों के बीच मिट्टी का दिया रखना , दिया कपूर अगरबती जलाना सब पूजा की तैयारी करते थे और पूजा के बाद सबसे पहले दादी माँ प्रसाद मुझे देती थी मेरे साथ सबके घर जाती थी वो और हाँ दादा जी के पास की प्यारी सी पीतल की घंटी थी वो दादी माँ निकालकर रखती थी और पूजा के समय मैं उसे बजाती थी
               दादी माँ स्वभाव से बहुत संतोषी थी वे कभी नहीं कहती थी की दीवाली पर मेरे लिए नई साड़ी लेकर आये पर हर बार मैं जब भी भंडारा जाती थी वे मेरे लिए नई फ्राक , नए चप्पल , नई डॉल और खूब सारे खिलौने दिलाती थी मुझे और दादी माँ दोनों को फटाखे अच्छे नहीं लगते थे इसलिए हम दोनों मिलकर अंदर के कमरे में जाकर मस्ती करते थे
              हम उनके रहते हुए हर दीवाली में दीपावली के 2 दिन पहले ही पहुँच जाते थे दोनों हमारे आते तक दरवाजे पर कुर्सी डालकर इन्तजार करते रहते थे दादी माँ खाना ही नहीं खाती थी हम आ जाए फिर सब साथ में खायेगे
1996 भंडारा में मैं और मेरी मम्मी रंगोली डालते हुए 
            आज दादी माँ और दादा जी हमारे बीच नहीं है पर उनके जाने के बाद आज मैं दीपावली के दिन उनका जन्मदिन अच्छे से तैयार होकर बहुत खुशी और उत्साह से अपने मम्मी पापा के साथ मनाती हूँ भगवान की पूजा के साथ - साथ उनकी पूजा भी करती हूँ मेरे लिए मेरे दादा जी और दादी माँ दोनों भगवान है दोनों की फोटो पर माला पहनाती हूँ फूल चाढाती हूँ सब पकवान मिठाई उनकी पसंद की बनाती हूँ और मैसूर पाक पर हम बाजार से जरुर लाते है सभी साज सजावट सब रस्में करती हूँ दादी माँ उनको रंगीन लाईट झालर के साथ घी के दीये जलाना बहुत पसंद था आज अपनी मम्मी के साथ मिलकर जलाती हूँ पूरे घर को दीये की रोशनी के साथ रंगीन झालर से जगमगा देती हूँ
               
२०१६ की दीपावली 





               मन वापस बचपन की गलियों में घूमने चला जाता है जहाँ बचपन के उन दिनों में चला जाता है जहाँ उनका प्यार और लाड़ दुलार था आज जब इस दुनिया में नहीं है फिर भी हर साल जब भी उनका जन्मदिन और दीपावली का त्यौहार मनाती हूँ मैंने उनकी आवाज रिकार्ड कर सम्हाल कर रखी ही कम्प्यूटर का टेप चालू कर देती हूँ उनकी आवाजे सुनाई आने लगती है ऐसा लगता है जैसे दादा - दादी हमारे बीच मौजूद है और हम उनके साथ उनके जन्मदिन और दीपावली त्यौहार मना रहे है
मेरे आंगन में रंगोली 
              कल भी दीपावली के दिन मैं अपनी दादी माँ का जन्मदिन उत्सव के जैसे अपने मम्मी पापा के साथ खुशी और उल्लास से मनाउंगी खूब सारी फोटो खीचूंगी और दादा जी - दादा माँ को याद करूंगी पाद पड़ोस में जितने भी बड़े बुजुर्ग है उन सबके घर जाकर उनका आशीर्वाद लेकर उन्हें दीवाली की बधाइयां दूंगी मेरा मानना है पास में बड़े - बुजुर्ग है तो हम त्यौहार पर उनके पास जाकर उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछना चाहिए और उनका आशीर्वाद जरुर लेना चाहिए


   सभी पाठकों को दीपावली की मीठी - मीठी खुशियों भरी शुभकामनाएं 

मुस्कुराइए ये तो जीवन है आज दुःख का रेला है तो कल खुशियों का मेला है




 
मेरी मुस्कान मेरा गहना 




        मित्रों मुस्कराना प्रकृति का और हमारे माता पिता का दिया सबसे बड़ा तोहफा है , एक चेहरे पर बड़ी प्यारी मुस्कान रखना यूं तो आसान नहीं है पर मुस्कुराने की कोशिश है जो हम कर सकते है ।
        खुलकर मुस्कुराइए मुस्कुराने में पैसा तो नहीं लगता है पाने वाला खुश हो जाता है और देने वाला का कुछ जाता नहीं है । मुस्कुराना बहुत अच्छी बात क्योंकि हमारे चेहरे पर आंसू नहीं मुस्कान ही है जो जचती है और लाखो लोग को अपना बना लेती है ।


दुःख अगर जीवन का ताला है तो मुस्कान उस दुःख को खोलने वाली चाबी है


  • मुस्कुराइए ये तो जीवन है आज दुःख का रेला है तो कल खुशियों का मेला है
  • मत रो की सब ख़त्म हो गया, मुस्कुराओ कि ऐसा हुआ।शांति की शुरुआत एक मुस्कान के साथ होती है..

  • यदि आप ये पढ़ रहे हैं तो बधाई हो , आप जीवित हैं।  अगर मुस्कुराने के लिए ये एक कारण नहीं है तो मुझे पता नहीं क्या है।मैं कल मुस्कुरा रहा था ,मैं आज मुस्कुरा रहा हूँ और मैं कल भी मुस्कुराऊंगा। महज इसलिए क्योंकि ये ज़िन्दगी किसी भी चीज के लिए रोने के लिए बहुत छोटी है।
  • कभी-कभी आपकी ख़ुशी आपके मुस्कान का कारण होती , लेकिन कभी-कभी आपकी मुस्कान आपके ख़ुशी का स्रोत हो सकती है।
  • आप अपनी मुस्कान बस कुछ ही देर तक बनाये रह सकते हैं , उसके बाद बस दांत रह जाते हैं।
  • अगर  आपके  अन्दर  बस  एक  मुस्कान  बची  है  तो  उसे  उन्हें  दीजिये  जिनसे  आप  प्रेम  करते  हैं .
  • अगर मैं तुम्हारी आँखों में दर्द देख सकूँ तो मेरे साथ अपने आंसू बांटो ।  अगर मैं तुम्हारी आँखों में खुशियां देख सकूँ तो मेरे साथ अपनी मुस्कान बांटो।
  • तुम पाओगे कि जीवन तब भी सार्थक है , अगर तुम सिर्फ मुस्कुरा सको।
  • चलिए एक काम करते हैं , जब मुस्कुराना मुश्किल हो तब हम एक दुसरे से मुस्कुराते हुए मिलें।  एक दुसरे पर मुस्कुराओ , अपने परिवार में एक-दुसरे के लिए समय निकालो।
  •  हम हमेशा एक दुसरे से मुस्कान के साथ मिलें , क्योंकि मुस्कान प्रेम की शुरुआत है।
  • जिस किसी के चेहरे पे निरंतर मुस्कान रहती है , वह एक ऐसी कठोरता छुपाये रहता है जो लगभग भयावह होती है।
  •  मैं तुम्हारे चेहरे पे मुस्कान और आँखों में दुःख से मोहित हो गया हूँ।
  • मुस्कुराने और भूल जाने में बस एक क्षण लगता है , फिर भी जिसे इसकी ज़रुरत हो , उसके लिए ये जीवन भर बनी रहती है।
  • एक मुस्कान मुसीबत से निकलने का सबसे अच्छा तरीका है , तब भी जब ये बनावटी हो।
  • अगर आप तब मुस्कुराते हैं जब आप अकेले हैं, तब आप वास्तव में मुस्कुरा रहे होते हैं।
  • दुनिया एक दर्पण की तरह है; आप इस पर क्रोधित होइए , और यह आप पर क्रोधित होगी। आप मुस्कुराइए और यह भी मुस्कुराएगी।
  • महिलाओं के शस्त्रागार में मुस्कान से बढ़कर कोई हथियार नहीं है जिसके आगे पुरुष इतना असहाय पड़ जाएं।
  • आप मुस्कान के साथ बहुत आगे तक जा सकते हैं।  आप मुस्कान और बन्दूक के साथ कहीं आगे तक जा सकते है 
  • हर उस व्यक्ति के लिए मुस्कान रखो जिससे तुम मिलने और मारने की योजना रखते है ।
  • एक पल के लिए ही सही , किसी और के चेहरे की मुस्कान बनो।
  • मुस्कान को तभी रोको जब वो किसी को चोट पहुंचा सकती हो।  नहीं तो , खिलखिला कर हंसो।
  • विज्ञान सोचना सिखाता है लेकिन प्रेम मुस्कुराना सिखाता है।
  • मुस्कान हैं जीवन का अनमोल ख़जाना, मुस्कान से बनता हैं जीवन सुहाना,
  • सफ़लता का एक सूत्र यद् रखना, चाहे कुछ भी हो जाये मुस्कान मत गवाना ।
  • जीवन में मुश्किले तमाम हैं, फिर भी लबों में मुस्कान हैं 
  • क्योकि जीना हर हाल में हैं, तो मुस्कुराकर जीने में क्या नुकसान हैं ।
  • जिंदगी एक हसीन ख्वाब हैं, जिअसमे जीने की चाहत होनी चाहिये 
  • गम खुद ही ख़ुशी में बदल जायेंगा, सिर्फ मुस्कुराने की आदत होनी चाहिये ।
  • जिंदगी पल पल ढलती हैं, जैसे रेट मुठ्ठी से फिसलती हैं, शिकवे कितने भी हो हर पल 
  • फिरभी हस्ते रहना क्योकि जिंदगी जैसी भी हैं, बस एक बार ही मिलाती हैं
  • बिंदास मुस्कुराओं क्या गम हैं, जिन्दगी में टेंशन किसको कम हैं, अच्छा या बुरा तो केवल भ्रम हैं, जिंदगी का नाम ही कभी ख़ुशी कभी गम हैं
  • ना कोई राह आसान चाहिये, ना ही हमें कोई पहचान चाहिये, एक ही चीज मांगते हैं रोज भगवन से अपनों के चेहेर पर हर पल मुस्कान चाहिये
  • खुश रहना मतलब यह नहीं की सब कुछ ठीक हैं,इसका मतलब यह हैं की आपने दुखों से ऊपर उठ कर जीना सीख लिया हैं
  • एक हरा हुआ इंसान हारने के बाद भी स्माइल करे तो, जितने वाला अपनी जित की ख़ुशी खो देता हैं, यही हैं स्माइल की ताकद
  • मुस्कुराओ, क्योकि आपकी हँसी किसी की ख़ुशी का कारन बन सकती हैं
  • जब जरसी मुस्कान से फ़ोटो अच्छी सकती हैं, तो हमेशा मुस्कुराने से जिन्दगी अच्छी क्यों नहीं हो सकती, इसलिए हमेशा मुस्कुराते रहो
  • इस प्यारे से दिल मे अरमान कोई रखना, दुनिया की भीड मे पहचान वही रखना 
  • प्यारे नही लगते जब उदास रहते हो, अपने होंठो पे मुस्कान वही रखना
  • आप की मुस्कूराहट रोज हो, कभी चेहरा कूल तो कभी रेड रोज हो,
  • १०० % खुशी तो १००% मौज हो, बस ऎसे ही आपका दिन रात रोज हो
  • छू ले आसमान जमीन की तलाश ना कर, जी ले जिंदगी खुशी की तलाश ना कर 
  • तकदीर बदल जायेगी खुद ही मेरे दोस्त, मुस्कुराना सिख ले वजह की तलाश ना कर
  • हर रिश्ते मे विश्वास रहने दो, जुबान पर हर वक्त मिठास रहने दो, यही तो अंदाज है जिंदगी जीने का, ना खुद रहो उदास, ना दूसरों को उदास रहने दो
  • मुस्कान को तभी रोको जब वो किसी को चोट पहुंचा सकती हो। नहीं तो , खिलखिला कर हंसो।
  • हँसमुख चेहरा एक जादुई आकर्षण हैं, जो हर किसी को मोह लेता है और मित्र बनाता है।
  • मुस्कान और मदद ये दो ऐसे इत्र हैं जिन्हें जितना अधिक आप दूसरों पर छिड़केंगे, उतने ही सुगन्धित आप स्वंय होंगे।
  • हमेशा हँसते रहिये, जितनी भी परेशानी हो मुस्कुराते रहिये।   एक दिन जिंदगी भी आपको परेशान करते-करते थक जाएगी।
  • जब जरा सी मुस्कान से फोटो अच्छी आ सकती है तो हमेशा मुस्कुराने से जिन्दगी क्यों अच्छी नहीं हो सकती है ।




Queen of Victoria

     
महारानी विक्टोरिया

पूरा नाम - अलेक्जेंड्रिना विक्टोरिया
पिता का नाम - प्रिंस एडवर्ड केंट और  स्ट्रेथियर्न के ड्यूक
माता का नाम  सैक्स- सोबुर्ग साल्फेल्ड की राजकुमारी विक्टोरिया ।
जन्म - सन 24 मई 1819 ई. में हुआ था।

          जब महारानी विक्टोरिया मात्र आठ महीने की ही थीं, तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। विक्टोरिया के मामा ने उनका पालन-पोषण किया और शिक्षा-दीक्षा का कार्य बड़ी निपुणता से संभाला। वे स्वयं भी एक बड़े योग्य और अनुभवी व्यक्ति थे। उनकी संगत में ही विक्टोरिया ने राजकाज का कार्य सम्भालना शुरू कर दिया था।

        लंदन में ईस्ट इंडिया कंपनी का इतना जबरदस्त विरोध हुआ कि संसद ने 1958 में कानून बनाकर भारत की सत्ता कंपनी से लेकर अंग्रेजी सरकार ने संभाल ली. 1876 में क्वीन विक्टोरिया ने इंगलैंड के प्रधानमंत्री डिजरायली पर दवाब डाला और उसी साल ब्रिटिश पार्लियामेंट ने इसके लिए प्रस्ताव पास कर दिया. हालांकि क्वीन विक्टोरिया चाहती थीं कि उनकी पदवी ये हो—एम्प्रैस ऑफ ग्रेट ब्रिटेन, आयरलैंड एंड इंडिया. लेकिन पीएम डिजरायली लोकतांत्रिक सरकार के राज में ये पदवी देकर विवाद खड़ा करने के मूड में नहीं थे. इसलिए डिजरायली ने क्वीन विक्टोरिया को इस बात के लिए राजी किया कि वो पदवी केवल इंडिया तक सीमित रहे और बाकायदा कानून बनाकर उसे संसद में पास किया गया.

        हालांकि इस बात पर क्वीन के कई करीबियों ने इस बात पर डिबेट की कि क्वीन के बजाय एम्प्रैस की पदवी दी जाए क्योंकि वो एम्परर (सम्राट) का फीमेल वर्जन था. क्वीन विक्टोरिया अपने आपको सम्राट की तरह देखना चाहतीं ना कि सम्राट की वीबी यानी क्वीन की तरह. इसके लिए विक्टोरिया ने बड़ी तैयारी की, भारत के वायसराय को आदेश दिया गया कि ब्रिटिश तौर तरीकों से वाकिफ दो भारतीयों को क्वीन की सेवा में भेजा जाए ताकि वो उन्हें भारतीय परम्पराओं और भाषा सिखा सकें. क्वीन को किसी भी भारतीय राजा महाराजा से मिलते वक्त उनके साथ रह सकें.

विवाह

        विवाह होने पर वे पति को भी राजकाज से दूर ही रखती थीं। परंतु धीरे-धीरे पति के प्रेम, विद्वत्ता और चातुर्य आदि गुणों ने उन पर अपना अधिकार जमा लिया और वे पतिपरायण बनकर उनके इच्छानुसार चलने लगीं। किंतु 43 वर्ष की अवस्था में ही वे विधवा हो गईं। इस दुःख को सहते हुए भी उन्होंने 39 वर्ष तक बड़ी ईमानदारी और न्याय के साथ शासन किया। जो भार उनके कंधों पर रखा गया था, अपनी शक्ति-सामर्थ्य के अनुसार वे उसे अंत तक ढोती रहीं। किसी दूसरे की सहायता स्वीकार नहीं की।

        उनमें बुद्धि-बल चाहे कम रहा हो पर चरित्रबल बहुत अधिक था। पत्नी, माँ और रानी - तीनों रूपों में उन्होंने अपना कर्तव्य अत्यंत ईमानदारी से निभाया। घर के नौकरों तक से उनका व्यवहार बड़ा सुंदर होता था। भारी वैधव्य-दुःख से दबे रहने के कारण दूसरों का दुःख उन्हें जल्दी स्पर्श कर लेता था। रेल और तार जैसे उपयोगी आविष्कार उन्हीं के काल में हुए।

राजतिलक
     
        अठारह वर्ष की अवस्था में विक्टोरिया गद्दी पर बैठीं। वे लिखती हैं कि मंत्रियों की रोज इतनी रिपोर्टें आती हैं तथा इतने अधिक कागजों पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं कि मुझे बहुत श्रम करना पड़ता है। किंतु इसमें मुझे सुख मिलता है। राज्य के कामों के प्रति उनका यह भाव अंत तक बना रहा। इन कामों में वे अपना एकछत्र अधिकार मानती थीं। उनमें वे मामा और माँ तक का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करती थी। 'पत्नी, माँ और रानी - तीनों रूपों में उन्होंने अपना कर्तव्य अत्यंत ईमानदारी से निभाया। घर के नौकरों तक से उनका व्यवहार बड़ा सुंदर होता था'

भारत में लोकप्रियता

        मात्र अठारह वर्ष की उम्र में ही विक्टोरिया राजगद्दी पर आसीन हो गई थीं। भारत का शासन प्रबन्ध 1858 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथ से लेकर ब्रिटिश राजसत्ता को सौंप दिया गया।

        महारानी विक्टोरिया इसकी जो उदघोषणा, महारानी के नाम से की गई, उससे वह भारतीयों में जनप्रिय हो गईं, क्योंकि ऐसा विश्वास किया जाता था कि उदघोषणाओं में जो उदार विचार व्यक्त किए गए थे, वे उनके निजी और उदार विचारों के प्रतिबिम्ब स्वरूप थे।

        विक्टोरिया मेमोरियल कोलकाता के प्रसिद्ध और सुंदर स्मारकों में से एक है। इसका निर्माण 1906 और 1921 के बीच भारत में रानी विक्टोरिया के 25 वर्ष के शासन काल के पूरा होने के अवसर पर किया गया था। वर्ष 1857 में सिपाहियों की बगावत के बाद ब्रिटिश सरकार ने देश के नियंत्रण का कार्य प्रत्यक्ष रूप से ले लिया और 1876 में ब्रिटिश संसद ने विक्टोरिया को भारत की शासक घोषित किया। उनका कार्यकाल 1901 में उनकी मृत्यु के साथ समाप्त हुआ।

        विक्टोरिया मेमोरियल भारत में ब्रिटिश राज की याद दिलाने वाला संभवतया सबसे भव्य भवन है। यह विशाल सफेद संगमरमर से बना संग्रहालय राजस्थान के मकराना से लाए गए संगमरमर से निर्मित है और इसमें भारत पर शासन करने वाली ब्रिटिश राजशाही की अवधि के अवशेषों का एक बड़ा संग्रह रखा गया है। संग्रहालय का विशाल गुम्बद, चार सहायक, अष्टभुजी गुम्बदनुमा छतरियों से घिरा हुआ है, इसके ऊंचे खम्भे, छतें और गुम्बददार कोने वास्तुकला की भव्यता की कहानी कहते हैं। यह मेमोरियल 338 फीट लंबे और 22 फीट चौड़े स्थान में निर्मित भवन के साथ 64 एकड़ भूमि पर बनाया गया है।

विक्टोरियन युग

        राजसिंघसन की जिम्मेदारी गंभीरता से लेकर राणी विक्टोरियाने प्रशासन की सभी छोटी-छोटी बातो पर ध्यान दिया। राणीने सुत्र हाथ में लिये तब इंग्लंड के इतिहास में राजाओं का मान था। लेकीन उनका महत्त्व कम करने वाली रक्तहीन क्रांती हुई थी। 1832 के बाद इंग्लंड का संसदीय सुधार मानदंड से संसद का संघटन और स्वरूप बदल रहा था। खुले व्यापार नीति की जोरदार हवा इंग्लंड में फ़ैल रही थी। उस वजह से 1833 के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापार रियायत रदद् करके इंग्लिश नागरिको को व्यापार खुला कर दिया। ये बदलाव विक्टोरिया राणी के आने के बाद बहोत बढ़ गया और वो स्फुर्तिदायी रहा।
राणी निश्चित रूप से कठोर राजनीतिज्ञ थी। राणी विक्टोरिया भारतीय राज्यो की ‘महारानी’ जाहिर हुई। उन्होंने इसका घोषणापत्र अपने नाम पर प्रसारित किया। ये घोषणापत्र आगे भारत में के ब्रिटिश राज का स्तंभ बना।

        आफ्रिका खंड के इजिप्त, सुदान, नाताल, दक्षिण आफ्रिका आदी। महत्वपूर्ण प्रांत उनके साम्राज्य के नीचे आये थे। इंग्लंड ने पूर्व आशिया में भी अपना प्रभाव बढ़ा दिया। उन्नीसवी सदी के आखिर में इस वैभव का कलश माना गया तो उसका नेतृत्त्व राणी विक्टोरिया की तरफ जाता है।
23 जनवरी 1901 को विक्टोरिया राणी का देहांत हुवा। एक महान युग का अंत हो गया ।

एक कुशल योध्दा वीर शिवाजी


                      
जन्म जयंती 19 फरवरी पुण्य तिथि 3 अप्रेल
विगत एक सहस्त्राब्दि में शिवाजी जैसा कोई हिन्दू सम्राट नहीं हुआ था.
स्वामी विवेकानन्द.


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                        दृणनिश्चयी, महान देशभक्त राष्ट्र निर्माता और कुशल प्रशासक शिवाजी का व्यक्तित्व बहुमुखी था माँ जीजा बाई के प्रति उनकी श्रद्धा और आज्ञाकारिता उन्हें एक आदर्श सुपुत्र सिद्ध करती है शिवाजी का व्यक्तित्व इतना आकर्षक था की उनसे मिलने वाला हर व्यक्ति उनसे प्रभावित हो जाता था साहस ,शौर्य और तीव्र बुद्धि के धनी शिवाजी का जन्म 19 फरवरी १६३० को शिवनेरी दुर्ग में हुआ था शिवाजी की जन्मतिथि के विषय में सभी विद्वान एक मत नहीं है कुछ विद्वान 30 अप्रैल १६२७ कहते है  ये भोंसले उपजाति के थे जो कि मूलतः क्षत्रिय मराठा जाति के थे उनके पिता अप्रतिम शूरवीर थे और उनकी दूसरी पत्नी तुकाबाई मोहिते थीं। 

                      शिवाजी की शिक्षा - दीक्षा जीजाबाई के संरक्षण में हुई थी माता जीजाबाई धार्मिक प्रवृति की महिला थी उनकी इस प्रवृति का घर प्रभाव शिवाजी पर भी था शिवाजी की प्रतिभा को निखारने में दादाजी कोंणदेव का भी विशेष योगदान था उन्होंने शिवाजी सैनिक और प्रशासकीय दोनों ही शिक्षा दी थी सेनापति बाजी पासलकर ने मार्शल-आर्ट का प्रशिक्षण दिया था। उन्होंने गोमाजी नाईक पनसम्बल से तलवारबाज़ी सीखी थी।शिवाजी में उच्चकोटी की हिंदुत्व की भावना लाने का श्रेय माता जीजाबाई को और दादा कोंणदेव को जाता है छत्रपति शिवाजी महाराज का विवाह सन 14 मई १६४० में सईंबाई निम्बालकर के लाल महल पूना में हुआ था  
कुशल वीर शिवाजी 
                 शिवाजी की बुध्दि बहुत व्यवहारिक थी वे सामाजिक, धार्मिक और सासंकृतिक परिस्थितीयो के लिए बहुत सजग थे हिन्दू धर्म ,गौ और ब्राह्मणों की रक्षा करना उनका उद्देश्य था शिवाजी हिन्दू धर्म के रक्षक के रूप में मैदान में उतरे और मुगल शासकों के विरुद्ध उन्होंने युध्द की घोषणा कर दी वे मुगल शासको के अत्याचारों से भली -भाँती परिचित थे इसलिए उनके अधीन नहीं रहना चाहते थे उन्होंने मावल प्रदेश के युवकों में देशप्रेम की भावना का संचार कर कुशल और वीर सैनिकों का एक दल बनाया शिवाजी अपने वीर और देशभक्त सैनिकों के सहयोग से जावली , रोहिडा , जुन्नार , कोंकण , कल्याणी अनेक प्रदेशों पर अधिकार स्थापित करने में कामयाब रहे प्रतापगढ़ और रायगढ़ दुर्ग जीतने के उन्होंने रायगढ़ को मराठा राज्य की राजधानी बनाया था
                     शिवाजी पर महाराष्ट्र के लोकप्रिय संत रामदास और तुकाराम का भी बहुत प्रभाव था संत रामदास शिवाजी के अध्यत्मिक गुरु थे उन्होंने ही शिवाजी को देश-प्रेम और देशोध्दार के लिए प्रेरित किया था ।
                  शिवाजी की बढती शक्ति बीजापुर के लिए चिंता का विषय थी आदिलशाह की विधवा बेगम अफजल खां को शिवाजी के विरुद्ध युद्ध के लिए भेजा था कुछ परिस्थितिवश दोनों खुल्लम - खुल्ला युध्द नहीं कर सकते थे अत : दोनों पक्षों ने समझौता करना उचित समझा 10 नवम्बर 16५९ को भेंट का दिन तय हुआ शिवाजी जैसे ही अफजल खां के गले मिले , अफजल खां ने शिवाजी पर वार कर दिया शिवाजी को उसकी मंशा पर पहले से ही शक था ,वो पूरी तैयारी से गए थे शिवाजी अपना बगनखा अफजल खां के पेट में घुसेड दिया अफजल खान की मृत्यु के बाद बीजापुर पर शिवाजी का अधिकार हो गया इस विजय के उपलक्ष्य में शिवाजी प्रतापगढ़ में एक मन्दिर का निर्माण करवाया जिसमें माँ भावनी की प्रतिमा को प्रतिष्ठित किया गया ।
कुशल योध्दा 
                शिवाजी एक कुशल योध्दा थे उनकी सैन्य प्रतिभा ने औरंगजेब जैसे शक्तिशाली शासक को भी विचलित कर दिया था शिवाजी की गोरिल्ला रणनीति (छापामार रणनीति) जग प्रसिध्द है अफजल खां की हत्या शाइस्ता खान पर सफल हमला और औरंगजेब जैसे चीते की मांद से भाग आना उनकी इसी प्रतिभा और विलक्षण बुध्दि का परिचायक अहि शिवाजी एक सफल कूनीतिज्ञ थे इसी विशेषता के बल पर वे अपने शत्रुओं को कभी एक होने नहीं दिए औरंगजेब से उनकी मुलाकात आगरा में हुई थी जहाँ उन्हें और उनके पुत्र को गिरफ्तार कर लिया था परन्तु शिवाजी अपनी कुशाग्र बुध्दि के बल पर फलों की टोकरियों में छुपकर भाग निकले थे मुगल- मराठा सम्बन्धों में यह एक प्रभावशाली घटना थी ।
                      बीजापुर के सुल्तान के सेनापति अफज़ल खान के विरुद्ध प्रतापगढ़ के संग्राम ने उन्हें एक महत्वपूर्ण सफलता दिलवायी जिसने उन्हें रातोंरात मराठों का नायक बना दिया। उन्होंने नियोजन, गति और उत्कृष्ट रणकौशल के माध्यम से यह जीत हासिल की। इसके बाद उन्होंने बीजापुर के सुल्तान के खिलाफ अनेको लड़ाइयाँ लड़ी जैसे की कोल्हापुर की लड़ाई, पवन खिंड की लड़ाई, विशालगढ़ की लड़ाई और अन्य कई लड़ाइयाँ।        
                      बीस वर्ष तक लगातार अपने साहस , शौर्य और रण कुशलता द्वारा शिवाजी ने अपने पिता की छोटी सी जागीर को एक स्वतंत्र और शक्तिशाली राज्य के रूप में स्थापित कर लिया था 6 जून १६७४ को शिवाजी का राज्यभिषेक हुआ था शिवाजी जनता की सेवा को ही अपां धर्म मानते थे उन्होंने अपने प्रशासन में सभी वर्गो और सम्प्रदाय के अनुयायियों के लिए समान अवसर दिए  कई इतिहासकारों के अनुसार शिवाजी केवल निर्भीक , शिवाजी के मंत्रीपरिषद् में आठ मंत्री थे जिन्हें अधत -प्रधान कहते है । शिवाजी के राष्ट्र ध्वज केशरिया रंग का है
                     जिस समय शिवाजी का साम्राज्य ढलान पर थाशिवाजी ने 360 किलों पर कब्ज़ा कर लिया था जिनमे से मुख्य थे कोंडना (सिंहगढ़)तोरणमुरंबदेवऔर पुरंदर , चाकन का किला ,सूपा का दुर्ग  किलों का भी आक्रमण कर लिया था।
                    कुशल और वीर शासक छत्रपति शिवाजी का अंतिम समय बड़े कष्ट और मानसिक वेदना से गुजरा घरेलू उलझनों और समस्याएं उनके दुःख का कारण थी बड़े पुत्र सम्भाजी के व्यवहार से वे ज्यादा चिंतित थे तेज ज्वर के प्रकोप से को अप्रैल 3, 1680 को शिवाजी का पुणे के रायगढ़ किले में स्वर्गवास हो गया  उनके साम्राज्य को उनके बेटे संभाजी ने संभाल लिया। लेकिन इससे सभी भारतीयों के मन पर उनकी छोड़ी छाप को कोई नहीं मिटा पाया। छत्रपति शिवाजी का नाम हमेशा लोकगीत और इतिहास में एक महान राजा के रूप में लिया जायेगा जिसका शासन एक स्वर्ण युग था, जिसने भारत की आज़ादी का रास्ता साफ़ करते हुए स्वतंत्रता की राह दिखायी।
                    शिवाजी केवल मराठा राष्ट्र के निर्माता ही नहीं थे अपितु मध्ययुग के सर्वश्रेष्ठ मौलिक प्रतिभा - सम्पन्न व्यक्ति थे महाराष्ट्र की विभिन्न जातियों के संघर्ष को समाप्त क्र उनको एक सूत्र में बाँधने का श्रेय शिवाजी को ही है इतिहास में शिवाजी का नाम , हिन्दू रक्षक के रूप में सैदेव सभी के मानस पटल पर विद्यमान रहेगा भारतीय इतिहासकारों के शब्दों के साथ कलम को विराम देते है
             शिवाजी महाराज एक वीर पुरुष थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन मराठा , हिन्दू साम्राज्य के लिए समर्पित कर दिया मराठा इतिहास में सबसे पहले पहले नाम शिवाजी का ही आता है और उच्च कर्म करने से इतिहास में वीर शिवाजी का नाम सदा के लिए अम्र हो गया आज महाराष्ट्र में ही नहीं पूरे देश में वीर शिवाजी महाराज की जयंती बड़े ही धूम धाम के साथ मनाई जाती है

छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म स्थान शिवनेरी दुर्ग
शिवाजी महाराज कहा करते थे :
'' अगर मनुष्य के पास आत्मबल है तो वो समस्त संसार पर अपने हौसले से विजय पताका लहरा सकता है ''
डॉ . रमेश चन्द्र मजुमदार के अनुसार -
'' भारतीय इतिहास के रंगमंच पर शिवाजी का अभिनय केवल एक कुशल सेनानायक और विजेता का न था ,वह एक उच्च श्रेणी के शासक भी थे । ''
सर जदुनाथ सरकार के अनुसार -
'' शिवाजी भारत के अंतिम हिन्दू राष्ट्र निर्माता थे , जिन्होंने हिन्दुओं के मस्तक को एक बार पुन: उठाया ''

शिवाजी महाराज  की  विशेषता 

1. अच्छी संगठन शक्ति  का होना ( Good Organizer )
शिवाजी ने बिक्री हुए मराठाओ को इक्कठा करके उनकी शक्ति को एक जुट कर एक महान मराठा राज्य की स्थापना की
2. वीर सैनिक ( Brave Soldier )
शिवाजी जैसे वीर भारत देश में बहुत कम हुए हैं , आज भी उनकी वीरता की कहानियो लोगो के उत्साह को बढ़ा देती हैं
3. महान मार्गदर्शक (* Good Leader )
शिवाजी ने मुगलो के राज्य में हिन्दू साम्राज्य स्थापित करने वाले एक मात्र राजा थे , उन्होंने केवल मराठाओ को ही नहीं वल्कि सभी भारतवासियो को भी नयी दिशा दिखाई

4.आज्ञाकारी पुत्र और शिष्य ( Obedient Son )
कहा जाता है शिवाजी अपनी माता की हर आज्ञा का पालन करते थे

सबसे महान जीत प्रेम की होती है , ये हमेशा के लिए दिल जीत लेती है - सम्राट अशोक



                                                     qutoes of smarat ashok 

Name
Ashoka Maurya / अशोक मौर्या  
Born
304 BCE
Pataliputra, Patna
Died
232 BCE (aged 72)
Pataliputra, Patna
Occupation
Indian emperor of the Maurya Dynasty who ruled almost all of the Indian subcontinent from c. 268 to 232 BCE.
Nationality
Indian
Achievement
One of India’s greatest emperors, Spread Buddhism across Asia. His symbol Ashoka Chakra is depicted on the flag of India.





















                 








  अशोक महान को भारत के महानतम सम्राटों में गिना जाता है । अशोक का साम्राज्य उत्तर में हिंद्कुश की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण और मैसूर तक और पूर्व में बंगाल से पश्चिम में अफगानिस्तान तक फैला हुआ था उस उस समय तक सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य माना जाता है

           जानते है इस महान सम्राट के अनमोल विचार


सभी इंसान मेरे बच्चे है जो मैं अपने बच्चों के लिए करना चाहता हूँ , मैं इस दुनिया में और इसके बाद भी उनका भला और खुशी चाहता हूँ , वही मैं हर इंसान के लिए चाहता हूँ । आप नहीं समझते है की किस हद तक मैं ऐसा चाहता हूँ और अगर कुछ लोग समझते है तो वे ये नहीं समझते की मेरी इस इच्छा की पूरी हद क्या है ।
अशोक

हर धर्म में प्रेम ,करुणा और भलाई का पोषक कोर है बाहरी खोल में अंतर है , लेकिन भीतरी सार को महत्व दीजिये और कोई विवाद नहीं होगा किसी चीज को दोष मत दीजिये , हर धर्म के सार को महत्व दीजिये और टीवी वास्तविक शान्ति और सद्भाव आएगा
अशोक
किसी को सिर्फ अपने ड्रम का सम्मान और दूसरों के धर्म की निंदा नहीं करनी चाहिए
अशोक

मैंने कुछ जानवरों और कई एनी प्राणियों को मारने के खिलाफ़ क़ानून लागू किया है ,लेकिन लोगों के बीच धर्म की सबसे बड़ी प्रगति जीवित प्राणियों को चोट न पहुँचाने और उन्हें मारने से बचने का उपदेश देने से आती है
अशोक

अन्य सम्प्रदायों की निंदा करना निषेध है ; सच्चा आस्तिक उन सम्प्रदायों में जो कुछ भी सम्मान देने योग्य है उसे सम्मान देता है
अशोक
सबसे महान जीत प्रेम की होती ही , ये हमेशा के लिए दिल जीत लेती है
अशोक

जानवरों व अन्य प्राणियों को मारने वालो के लिए किसी भी धर्म में कोई जगह नहीं हैं.
अशोक

दूसरो के द्वारा बताये गये सिद्धांतो को सुनने के लिए हमें हमेशा तैयार रहना चाहिए.

अशोक

जितना कठिन संघर्ष करोगे, आपके जीत कि ख़ुशी भी उतनी ही बढ़ जयेगी.

अशोक



सफल राजा वही होता हैं, जिसे पता होता हैं कि जनता को किस चीज की जरूरत हैं.

अशोक

कोई भी व्यक्ति जो चाहे प्राप्त कर सकता हैं, बस उसे उसकी उचित कीमत चुकानी होगी.

अशोक

एक राजा से ही उसकी प्रजा की पहचान होती हैं.

अशोक


वह व्यक्ति जो अपने सम्प्रदाय को ऊँचा दिखाने के लिए दूसरे संप्रदाय का मजाक बनाता है, वह ऐसा करके अपने ही सम्प्रदाय को बहुत नुकसान पहुंचाता है.

अशोक

हमें अपने माता पिता का आदर करना चाहिए और अपने से बड़ों का भी. जो जीवित प्राणी है उनके प्रति दया दिखानी चाहिए और हमेशा सच बोलना चाहिए.

अशोक

अपने सम्प्रदाय की गरिमा दिखाने के उद्धेश्य से किसी का आदर नहीं करना चाहिए और न ही किसी और के सम्प्रदाय को नीचा दिखाना चाहिए.

अशोक