शाही एक है हर टुकडा चख़ के देखूं तो ज़रा हर टुकड़े में कितनी मिठास





शाही टुकड़ा बनाने के पहले मैंने एक पारिवारिक मित्र के घर पर खाया मुझे यह बहुत ज्यादा पसंद था इसलिए मैं इसे
 " मीठा ब्रेड " कहती हूँ । तबसे मन था यह की यह डिश तो जरूर बनाऊँगी ।

शाही टुकड़ा यह मैंने तब बनाया था जब मैं बी. एड कर रही थी बी . एड के दौरान बहुत सारी प्रतियोगिता होती थी जिसमें रसोई की प्रतियोगिता भी हुई थी जिसमें भाग लेने वाले प्रतिभागियों को कोई न कोई लज़ीज़ व्यंजन बनाकर लाना था जिसका व्यंजन जितना स्वादिष्ट उसका फर्सट, सेकेंड , थर्ड लगेगा हालांकि मेरा नम्बर नहीं लग पाया परन्तु मेरे द्वारा बनाया शाही टुकड़ा सभी शिक्षकों व अन्य लोगों को इतना पसंद आया कि 1 घण्टे में सारा शाही टुकड़ा खत्म हो गया सबने मेरे पाककला और शाही टुकड़े बहुत प्रशंसा की ।

आज यहां आप भी मेरे पाककला के शाही टुकड़े बनाने की विधि से अवगत होइये -


आवश्यक सामग्री -

ब्रेड - 4
चीनी - 1 कप (200 ग्राम) चाशनी के लिये दूध - 500 मिली.
चीनी - 1 टेबल स्पून रबड़ी में डालने के लिये
केसर - 20-25 धागे
चिरोंजी - 1 टेबल स्पून
बादाम - 4 पतले पतले काट लीजिये
काजू - 10-12 पतले पतले काट लीजिये
पिस्ते - 8-10 पतले पतले काट लीजिये
देशी घी - 1/2 कप (100 ग्राम )
शाही टुकड़ा बनाने की विधि

चाशनी बना लीजिये:
सबसे पहले चीनी को किसी बर्तन में डालकर, आधा कप पानी डालकर मिलाइये और चाशनी बनने के लिये गैस पर पकने दीजिये, चाशनी में उबाल आने और चीनी घुलने के बाद, 2 मिनिट पकाने के बाद चाशनी को चैक कीजिये, चाशनी की 1-2 बूंद किसी बर्तन में गिराइये और ठंडी होने पर उंगूठे और उंगली के बीच चिपका कर देखिये, चाशनी चिपकनी चाहिये और छोटा सा 1 तार निकलना चाहिये, यानि कि 1 तार की चाशनी बना कर तैयार कर लीजिये.
रबड़ी बनाइये:
दूसरे किसी भारी तले के पैन में दूध डालकर गरम होने रख दीजिये, मीडियम गैस पर दूध को गरम होने दीजिये, दूध के ऊपर जैसे ही मलाई की परत आ जाय उसे किनारे से जमाते जाइये. सारे दूध का 1/4 भाग तले में रह जाय, गैस बन्द कर दीजिये और किनारे से जमी मलाई को उसमें मिला कर, उसमें चीनी, रबड़ी तैयार कर लीजिये.


शाही टुकड़े के लिये ब्रेड को 2 भागों में काट लीजिये, ये टुकड़े तिकोने या आयताकार जैसे आप चाहें उस तरह के काट लीजिये. घी को गरम कीजिये, मीडियम गर्म घी में ब्रेड के 2-3 टुकड़े डालिये और गोल्डन ब्राउन होने तक तल कर निकाल लीजिये. सारे ब्रेड के टुकड़े तल कर निकाल लीजिये.


ब्रेड का एक एक टुकड़ा उठाकर चाशनी में डुबाइये, 10-15 सेकिन्ड डूबाने के बाद उसे निकाल कर प्लेट में लगा कर रखिये, सारे टुकड़े चाशनी में डुबाकर निकाल लीजिये.

ब्रेड के चाशनी में डूबे टुकड़ों को प्लेट में एक एक करके लगा लीजिये, 1-2 चम्मच रबड़ी 1 ब्रेड के टुकड़े पर पतला फैलाते हुये लगाइये. ऊपर से कटे हुये मेवे, चिरोंजी , केसर के धागे डालकर सजाइये. बहुत अच्छे शाही टुकड़ा तैयार है, परोसिये और खाइये. शाही टुकड़े को फ्रिज में रखकर 2 दिन तक खाया जा सकता है.

सुझाव:

चाशनी पतली रहेगी तो ब्रेड चाशनी में डुबाने के बाद क्रिस्प नहीं रहेंगी. चाशनी गाढ़ी होने पर चाशनी ब्रेड के ऊपर जम जाती है.रबड़ी को बहुत पतला या बहुता गाढ़ा नहीं बना है ।

पूरन पूड़ी





        पूरन पोली खास कर महाराष्ट्र में बनाई जाती हैं ये यहाँ की पारम्परिक स्वीट डिश है.
         यह मेरी दादी माँ बनाया करती थी उनसे औऱ मम्मी सीखा पूरन पूड़ी बनाना इसका मीठा स्वाद अक्सर मुझे इतना अदभुत लगता कि मैं इसे बचपन से आज तक बहुत चाव से खाती बनाती आ रही हूँ ।
         यह सिर्फ महाराष्ट्र ही नहीं और भी जगहों पर खाई जाती हैं जैसे मैने जबलपुर मध्यप्रदेश में नमकीन भरवा पूड़ी खाई थीं वहां इसे मीठी खीर के साथ खाया जाता है ।


          दादी माँ अब नहीं है पर उनसे सीखी हुई पूरन पूड़ी बनाने व खाने में बहुत मजा आता है ।

मेरी दादी माँ 

पूरन पोली बनाने की सामग्री
Content to prepare Puran Poli :-

2 कप गेहूं का आटा या मैदा
आटा गुथने के लिये पर्याप्त पानी
2 चम्मच तेल या घी
पूरन की सामग्री :
1 ¼ कप चना दाल
¼ 2 चम्मच शक्कर का बूरा क्योंकि मुझे इलायची पसन्द नहीं
2 चम्मच घी

पूरन पूड़ी बनाने की विधि

आटा या मैदे को अच्छे से छान ले उसमे स्वादानुसार घी डालकर पानी की मदद से मुलायम हुआ आटा बनाये. अब उसे सेट होने के लिये 40-50 मिनटों तक उसे कपडे के गीलेपन में या फ्रिज रखेंमें बाद में दोबारा गुंथे.

         चना दाल को अच्छे से धोकर 1 सिटी बजने तक कूकर में पकाये. और बाद में दाल में से पानी अलग कर ले.पकी हुई दाल का पेस्ट बनाये और गैस पर कढ़ाई में थोडा सा घी गर्म करके पिसी हुयी दाल का पेस्ट अच्छे से भुने बाद मे उसमे शक्कर  डालकर मिश्रण तैयार करे. मिलाते समय उसमे जरा भी पानी न डाले.
           अब मिश्रण थंडा करके उसके छोटे-छोटे गोले बनाये. अब गुंथे हुए आटे को भी छोटे गोलों की कटोरी बनाये औऱ कटोरी में  बनाये हुये पूरन का एक पूरन भर दे और कटोरी को बन्द कर ले. अब उसे आटा लगाकर थोड़ा थोड़ा बेले ताकी रोटी तैयार हो । रोटी बेलते समय ध्यान रहे की हल्के हाथ से रोटी बेले की रोटी में से पूरन बाहर न आये.
            अब तवे के चारो तरफ घी लगाये. उसपर पोली रखे और दोनों ही तरफ से उसे अच्छे से सेके. सकने के बाद आप उसपर थोडा और घी डालकर परोस सकते हो……                            आप इसे घी, दूध या के साथ भी खा सकते हैं.  वैसे तो पूरन पूड़ी के साथ कुछ औऱ ना भी हो तो भी अच्छा लगता है । क्योंकि इसका मीठा मीठा स्वाद बहुत अनूठा होता है एक दो से मन नहीं भरता है ।

फूलों से हँसना सीखो भौंरो से गाना

                                          

  


गेट्स ने कहा है
"learning is a process of improvement "
प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में हमेशा कुछ न कुछ सीखता रहता है नये नये अनुभव एकत्र करता रहता है ये नवीन अनुभव व्यक्ति के व्यवहार में वृद्धि तथा संशोधन करते हैं

ये अनुभव तथा इनका उपयोग सीखना कहलाता है ।
मानव अपने जन्म से मृत्यु तक कुछ न कुछ सीखता रहता है उसके सीखने की प्रक्रिया में विराम और अस्थिरता नहीं आती है ।
स्किनर ने कहा कि सीखना व्यवहार में उत्तरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है ।
क्रो एन्ड क्रो ने कहा है सीखना आदते, ज्ञान औऱ अभिवृत्तियों का अर्जन है ।


यदि किसी छोटे बच्चे के सामने दीपक रखा होता है तो वह स्वाभाविक ही दीपक की लौ को छूने के लिए हाथ आगे बढ़ाता है पर उसका हाथ जल जाता है उसे तकलीफ होने लगती है औऱ वह तुरंत अपना हाथ दीपक की लौ से हटा लेता है अब पुनः जब वह सामने रखे हुए दीपक को देखता है तो अगली बार दीपक की लौ को छूने का स्वाभाविक व्यवहारनहीं करता है यदि उसके सामने दीपक जलाया जाए तो वह दूर भागने लगता है । इस प्रकार स्वाभाविक व्यवहार में जो परिवर्तन हुआ इस क्रिया को सीखना कहते है।



सीखने की विशेषताएं

  • सीखना सम्पूर्ण जीवन चलता है ।
  • व्यक्ति सीखते हुए परिवर्तन करते हुए आगे बढ़ता है ।
  • सीखना व्यवहार के परिणामस्वरूप परिवर्तन है
  • सीखना विकास है व्यक्ति दैनिक कार्यों अनुभवों से सीखता है फिर उसका विकास होता है ।
  • सीखना व्यक्ति द्वारा नया कार्य करना है 
  • सीखना नये व पुराने अनुभवों का संगठन हैं 
  • मानव ही नहीं संसार के जीवधारी, पशु-पक्षी, कीड़े मकोड़े भी सीखते हैं ।
  • सीखने में लक्ष्य प्राप्त करना जरूरी है बिना लक्ष्य के सीखना संभव नहीं ।
  • जिस कार्य में बुद्धि और विवेक हो वह कार्य सरल होता है ।
  •  सक्रिय रहकर सीखना वास्तविक सीखना है 
  • व्यक्ति जो सीखता है उससे  व्यक्तिगत व सामाजिक लाभ होता है  
  • व्यक्ति का सम्बंध जैसे वातावरण होता है वह नई बाते सीखता है ।
  • सीखना किसी बात की खोज करना है ।


सीखने को प्रभावित करने वाले कारक

  1. विषय सामग्री का स्वरुप 
  2. शारिरिक मानसिक स्वास्थ्य
  3. परिपक्वता
  4. सीखने का समय व स्थान
  5. सीखने की इच्छा
  6. प्रेरणा
  7. अध्यापक व सीखने की प्रक्रिया
  8. सीखने का उचित वातावरण
  9. सीखने की विधि
  10. सम्पूर्ण परिस्थिति





सीखने की विधियां
1 करके सीखना
2 स्वंय निरीक्षण करके सीखना
3 परीक्षण करके सीखना
4 विचार व्यक्त करके प्रश्न पूछकर सीखना
5 वर्कशॉप से सीखना
6 सम्मेलन गोष्ठी द्वारा सीखना


हम जन्म से मृत्यु तक गलती करते हैं फिर पुनः करते हैं सीखते है । सीखना अत्यंत महत्वपूर्ण है मनुष्य जन्म के बाद से ही सीखना आरंभ कर देता है आज हम जो कुछ भी वह सीखने का ही परिणाम है ।

खाना,पीना, बोलना , चलना , पढ़ना, लिखना , कुछ नया करना, अन्य महत्वपूर्ण कार्य करते हुए अभ्यास करते हुए ही सीखते हैं औऱ आगे बढ़ते हैं हम जितना ज्यादा सीखेंगे उतना ही आगे बढ़ेंगे ।
" इसलिए सीखना विकास की प्रक्रिया है ।"

निर्भया का बलत्कारी अब बड़ा हो गया

                         

" सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए कुछ कानून का पालन करना सबके लिए अनिवार्य होता है चाहे वह वयस्क हो या बालक ।


  •  यदि बालक या किशोर उन कानूनों अवहेलना करके समाज विरोधी कार्य करता है तो उसका यह कार्य बाल अपराध कहलाता है । "

 गुड़ ने कहा है कोई भी बालक जिसका व्यवहार सामान्य सामाजिक व्यवहार से भिन्न हो जाए कि उसे समाज विरोधी कहा जा सके बाल अपराधी है ।

  • अपराध वह कृत्य है जिसके लिए समाज दंड दे सकता है ।
  • बाल अपराध किसी स्थान विशेष के कानून के अनुसार किसी कम आयु के बच्चे द्वारा किया जाने वाला अपराध ।
  • भारतीय विधान धारा 83 के अनुसार 12 वर्ष से कम आयु वर्ग के कम आयु वर्ग के नासमझ बालक को अपराधी नहीं माना जाता ।
  • भारतीय दंड विधान के अनुसार 7 वर्ष से 16 वर्ष के मध्य कई गया किसी भी प्रकार का अपराध 'अपराध ' के अंर्तगत आता है । 
  • जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 1986 बालक /किशोर अपराधी की अधिकतम  आयु 16 वर्ष है ।


                      बाल अपराध के उदाहरण

चोरी करना , मारपीट, झगड़ा, झूठ बोलना , सिगरेट पीना, शराब पीना , रात में आवारा घूमना , हत्या, धोखा, जालसाजी , आत्महत्या, विद्यालय से भागना, तोड़ फोड़ आदि ।



"बाल अपराध के कारण कुछ होते हैं यूँही नहीं कोई बालक अपराध करता है उस बालक के जीवन में अवश्य ही ऐसी कोई घटना छुपी होती है जिसके कारण वह बाल अपराधी बन जाता है "


                       बाल अपराध के कारण

  • आनुवांशिकता
  •  माता पिता का तलाक या मृत्यु 
  •  अशिशित माता पिता 
  •  कुसामायोजन 
  •  मानसिक तनाव चिंता , कुंठा
  •  दहेज़ प्रथा , बेमेल विवाह, प्रेम विवाह सामाजिक कुप्रथाएँ
  •  बालश्रम या नौकरी 
  •  ग़रीबी भूखमरी 
  •  बुरे साथी बुरी संगत 
  •  मानसिक रोग 
  •  गन्दी घनी बस्तियां 
  •  सही मनोरंजन नहीं मिलना
  •  संवेगात्मक स्थिरता 
  •  बालक का मन्दबुद्धि या तीव्रबुद्धि होना 
  •  बालक के साथ दुर्व्यवहार
  •  विधालय के कारण की स्थिति , मनोरंजन का अभाव, परीक्षा की सही प्रणाली का अभाव 
  •  अनैतिक परिवार
  •  घर में सौतेली माँ का होना 
  •  अश्लील फिल्में व गीत , पुस्तकें 
  •  शारिरिक दोष 
  •  यौनांगो का तीव्र विकास 
  •  ज़रूरतें पूरी न होने पर मनोविकृति ।


   

                   बाल अपराध का निवारण

 परिवार की भूमिका - उचित वातावरण, सहयोग, प्रेम , सहानुभूति निर्देशन करना चाहिए।
 माता पिता को कुछ समय उनके साथ बिताकर उनकी गतिविधियों का निरीक्षण करना चाहिए और उचित परामर्श, अच्छी आदतों का निर्माण ।
विद्यालय की भूमिका - योग्य शिक्षक प्रेम और सहानुभूति का अच्छा वातावरण बालक के लिए पुस्तकालय में अच्छी पुस्तकों  की व्यवस्था , स्वतंत्रता, ध्यान उपचारात्मक कक्षा ।
 समाज की भूमिका - बालको को राजनीति से दूर रखें गन्दी बस्तियों , शराब , जुआ अड्डों को समाप्त कर अच्छा वातावरण बनाना चाहिए । सामाजिक संघ का निर्माण और सामाजिक कार्य करने को प्रेरित अनैतिक कार्यों पर प्रतिबंध ।
 कारावास - कारावास में बंदी की आयु बढ़ने पर उसके व्यवहार में बदलाव आता है मुक्त होने के बाद अपराधी प्रवृत्ति खत्म हो जाती है। कारावास में तब ही रखा जाता है जब बालक उम्र में अधिक हो या अपराध गम्भीर हो ।
जब कोई बालक अपराध करता है तो उसे सुधार गृह में भेजना चाहिए यहां बाल अपराधी को सुधारा जाता है ।
 मनोवैज्ञानिक उपचार - बाल अपराधी का विश्लेषण  , मनोवैज्ञानिक जांच , निर्देशन एवं उसकी दमित इच्छाओं का उपचार, साक्षात्कार , खेल, चिकित्सा साइको ड्रामा ।
 प्रोबेशन- 14 वर्ष से कम उम्र के बालपराधी को प्रोबेशन की देखरेख में सुधार के लिए रखा जाता है व मार्गदर्शन दिया जाता है ।

 सुधार विद्यालय - इनमें 14-15 वर्ष के बाल अपराधियो को 5 वर्ष तक रखा जाता है यहां पढ़ना लिखना सीखना के साथ बालक को उधोगों का प्रशिक्षण दिया जाता है ।


विशेष - हरलोक बताते हैं कि समाज विरोधी कार्य ज्यादातर 11 से 14 वर्ष की अवस्था में चरमसीमा पर होता है ।

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के

             
            प्रसार शिक्षा एक अनौपचारिक शिक्षा है जो ग्रामीण जनों को राष्ट्रीय साधनों से अपने प्रयास द्वारा अपने रहन-सहन के स्तर को ऊंचा उठाने की शिक्षा देती है ।
         
 
             प्रसार शिक्षा बहुआयामी शब्द है शिक्षा का प्रसार यह मानव समाज विशेषकर ग्रामीण समाज में रहने वाले लोगों को को शिक्षित एवं जागरूक बनाने की एक पध्दति है जो उन्ही की ज़रूरतों एवं समस्याओं पर निर्भर है 
 प्रसार शिक्षा शिक्षण की एक अनौपचारिक प्रक्रिया है जो शिक्षा पध्दति में शिक्षा देने वाले या शिक्षा के कार्य मे लगे हुए कर्मचारी , शिक्षक पूर्व निर्धारित क्षेत्रों में छात्रों के पास विभिन्न स्थानों पर जाकर शिक्षा का प्रचार -प्रसार करते हैं ।




         प्रसार शिक्षा का उद्देश्य -

1 प्रसार शिक्षा ग्रामीणों को उनकी वर्तमान स्थिति के प्रति जागरूक करना है प्रसार शिक्षा उन्हें उनकी समस्याओं के विषय में बताती है औऱ उन्हें क्रियाशील गतिशील बनाकर बदलाव के लिए प्रेरित करती है ।
2 प्रसार शिक्षा ग्रामीणों को स्वास्थ्य के विषय में जानकारी देती है बीमारियों के कारण , उनसे बचाव , टीकाकरण कब हो, डॉक्टरी सहायता कब ली जाए सारी बातों की जानकारी प्रसार शिक्षा के माध्यम से मिलती है ।
3 प्रसार शिक्षा ग्रामीणों के लिए वैकल्पिक रोजगार हेतु ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर एवं लघु उद्योगों की व्यवस्था करती हैं ।
4 प्रसार शिक्षा ग्रामीणों को स्वंय अपनी मदद के लिए प्रेरित करती है वे स्वयं अपनी समस्याओं का समाधान के लिए प्रयास करें इसके लिए उनका मार्गदर्शन करती है ।
5 प्रसार शिक्षा का उद्देश्य ग्रामीणों को पेयजल, सफाई, शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना , टीकाकरण, उन्नत बीज, खाद आदि ।
6 नृत्य, नाटक, गायन,के माध्यम से विलुप्त हो रही संस्कृति के ज्ञान के साथ साथ अपनी सांस्कृतिक धरोहर से ग्रामीणों को परिचित कराती है ।
7 प्रसार शिक्षा ग्रामीणों में कुरीतियों एवं पंरपराओं के विरुद्ध विभिन्न माध्यमों द्वारा जागरूकता लाकर उन्हें दूर करने में सहायता देती है आगे बढ़ने में प्रेरित करती है ।
8 प्रसार शिक्षा ग्रामीणों को स्वंय अपनी मदद करने के अलावा दूसरों की मदद करने की शिक्षा देती है।



         प्रसार शिक्षण के साधन
1 खेत या घर ग्रामीणों से मिलना
2 कार्यालय में भेंट
3 समूह चर्चा
4 सामान्य सभा
5 अभियान
6 सामूहिक कार्य
7 परिपत्र
8 समाचार पत्र
9 ब्लैक बोर्ड
10 फोटोग्राफ
11 पोस्टर
12 फ्लैश कार्ड
13 प्रदर्शनी मेला
14 शिक्षण हेतु भ्रमण
15 रेडियो कार्यक्रम
16 टेप रिकॉर्डर
17 टेलीविजन
18 कठपुतली
19 फ़िल्मस
              प्रसार शिक्षा मानवीय व्यवहार पर आधारित शिक्षण पध्दति है जिसका उद्देश्य सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं बल्कि उसके परिवार और सम्पूर्ण समाज का सर्वागीण विकास करना है ल आर्थिक रूप से समृद्ध होना प्रत्येक व्यक्ति की अभिलाषा होती हैं और इसी अभिप्रेरणा तथा स्थान पाने की इच्छा के कारण व्यक्ति कुछ न कुछ सीखने का प्रयास करता है । सीखने से उसके व्यवहार में परिवर्तन आते है धीरे धीरे यह व्यवहार व्यक्ति के व्यक्तित्व का अटूट हिस्सा बन जाते है । सीखने की क्रिया जीवनभर चलती रहती है ।

युवाओं के लिए आवश्यक है संतुलित आहार

                             


                           शैशवास्था में मनुष्य का प्रमुख आहार होता है माँ का दूध उसी से वह अपने पोषण और वृद्धि के लिए उचित विटामिन , प्रोटीन ,वसा व् कार्बोहाइड्रेट आदि प्राप्त करता है लेकिन जैसे जैसे वह बड़ा होता है,माँ के दूध पर उसकी निर्भरता समाप्त हो जाती है और वह प्रकृति में उपलब्ध अन्न,फल व यानी खाधापदार्थ ग्रहण कर सकता है यह हर सजीव का गुणधर्म है की वह एक निश्चित उम्र तक ही वृद्धि कर सकता है चाहे वह मनुष्य हो पशु-पक्षी या पेड़-पौधे उसके बाद उसकी बाढ़ तो रुक जाती है लेकिन जीवित रहने,अपने क्रियाकलापों और शरीर को बनाये रखने के लिए उसे आहार की आवश्यकता होती है यह उम्र उसकी युवाव्स्था    होती है उचित व संतुलित आहार
                           ऐसा नहीं है की हम केवल भूख लगने पर ही खाते है हममें से की कई युवा दिन में कई बार खाते है और कुछ युवा खुद को इतना युवा समझते है की खाना खाते ही नहीं है और खाते भी है तो समोसा,नूडल्स,पिज़्ज़ा,बर्गर जैसे जंक फ़ूड इसलिए यह जानना जरूरी है की हम क्यों खाते है कितना खाते है,अपने भोजन में किन तत्वों को शामिल करते है और उनसे क्या बनता है हमें यह भी मालूम होना चाहिए की इन तत्वों की ज़रूरत हमें क्यों है और यदि यह पर्याप्त मात्रा में न मिलें तो हमारे शरीर का क्या नुक्सान होगा

                          हमारे भोजन में प्रमुख पोषक तत्व है कार्बोहाइड्रेट , प्रोटीन, चर्बी , विटामिन और खनिज पदार्थ इनमें कार्बोहाइड्रेट ,प्रोटीन,चर्बी या वसा हमें ऊर्जा प्रदान करते है और युवावस्था में सबसे अधिकआवश्यकता ऊर्जा की ही होती है खेलकूद के लिए , पढ़ने-लिखने के लिए भागदौड़ के लिए और साइकिल चलाने के लिए जिस तरह स्कूटी या बाइक चलाने के लिए पेट्रोल की आवश्यकता होती है उसी तरह हमारे शरीर को चलाने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है यह उर्जा हम भोजन से प्राप्त करते है यदि हम कोई काम ना भी करे तो दिल के धड़कने के लिए,फेफड़ो को सांस लेने के लिए और पाचन क्रिया के लिए हमें ऊर्जा की आवश्यकता होती है कहने का तात्पर्य यह है की यदि हम कुछ न करें और सिर्फ सोते रहे तो भी हमें ऊर्जा की ज़रूरत होगी । लेकिन ऐसा कौन सा युवा है जो इस उम्र में भी सोते रहना पसंद करेगा या आलस्य में अपना जीवन बिताना चाहेगा ? इसलिए हम जितना परिश्रम करेंगे हमें उतनी ही ऊर्जा की ज़रूरत होगी और उसी अनुपात में हमें कम या आधिक भोजन की आवश्यकता होगी
                        युवा लडकों को अक्सर उनकी माताएं ताना देती रहती है की क्या दिनभर खाता ही रहता है ,वही लड़कियों को कहा जाता है देखो दुबली रहने के चक्कर में सूख कर काँटा हो गई , कुछ खाती ही नहीं सच देखा जाए तो यह दोनों स्थितियाँ ठीक नहीं है आवश्यकता से अधिक या कम खाने पर शरीर से प्रोटीन , कार्बोहाइड्रेट ,चर्बी का संतुलन बिगड़ जाता है और युवाओं को दैनिक कार्यो के लिए जितनी ऊर्जा की आवश्यकता होती है वह नहीं मिल पाती आगे चलकर शरीर पर इसका परिणाम भी अच्छा नही होता या तो वे दुबले रह जाते है या आवश्यकता से अधिक मोटे हो जाते है  और रोग प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जाने से बीमार हो जाते है

                                आइये देखते है की ऊर्जा के प्रमुख स्रोत , कार्बोहाइड्रेट , प्रोटीन, चर्बी हमें कहाँ से प्रापर होते अहि और शरीर पर इनका क्या प्रभाव पड़ता है चावल,गेहूं ,बाजार ,ज्वार जैसे अन्न कार्बोहाइड्रेट के प्रमुख स्रोत है गुड़ और शक्कर गाढ़े कार्बोहाइड्रेट होते है और ये हमारे शरीर को भरपूर ऊर्जा देते है यह हमारे भोजन के आवश्यक अंग है इसलिए हम इन्हें अधिक मात्रा में लेते भी है
                  ऊर्जा का दूसरा स्रोत है प्रोटीन हमारे शरीर की हर इकाई जैसे कोशिका , हड्डी, रक्त,मस्तिष्क,चमड़ी व् बाल आदि में प्रोटीन होते है हमारा शरीर प्रोटीन से ही बना है जैसे कि इट - गारे से मकान बनता है । यदि खेलकूद या दुर्घटना में हमें चोट लगती है तो प्रोटीन ही उसे ठीक करता है शरीर में कोई घाव् हो जाए ,कोई हिस्सा गल जाए या सड़ जाए तो प्रोटीन ही उसकी मरम्मत करता है जिस तरह एक ग्राम कार्बोहाइड्रेट से हमें चार कैलोरी ऊर्जा मिलती है उसे तरह एक ग्राम प्रोटीन से भी चार कैलोरी ऊर्जा मिलती है लेकिन युवाओं को चाहिए की ऊर्जा के लिए कार्बोहाइड्रेट युक्त आहार का सेवन करें और प्रोटीन को शरीर की मरम्मत के लिए सुरक्षित रखें
                             अब हम देखेंगे की यह प्रोटीन हमें मिलता कहाँ से है पशुओं से प्राप्त होने वाले प्रोटीन हमें मांस-मछली , अंडे , दूध से प्राप्त होते है यदि पोषक तत्वों के आधार पर देखें तो अंडे से प्राप्त प्रोटीन को सौ में से नब्बे अंक मिलेंगे ,मॉस औए दूध से प्राप्त प्रोटीन को सौ में से सत्तर संक दाल और चने से प्राप्त प्रोटीन को सौ में से पचपन अंक तथा सब्जियों से प्राप्त प्रोटीन को इससे भी कम अंक
                              यदि ऐसे है तो हमारी माताएं हमें सब्जी अधिक खाने को क्यों कहती है इसलिए की हम में से बहुत सारे युवा शाकाहारी है और प्रोटीन के मांसाहारी स्रोत हमें पसंन्द नहीं है हाँ सब्जी हमें रोज खाते है यह बात अलग है घर में पकने वाली सब्जियों में से बहुत सारी सब्जियाँ युवाओं को नापसंद होती है
                            हम अपने भोजन में दूध-घी व दाल शामिल कर सकते है इसके अलावा मूंगफल्ली ,बादाम, अखरोट और नारियल में भी प्रोटीन होता है ऐसा भी नहीं है की गेहूं - चावल और अन्न खाधान्न में बिलकुल प्रोटीन नही होता होता है लेकिन कम क्योंकि हम लोग रोज काफी मात्रा में गेहूं-चावल खाते है इसलिए उनसे भी प्रोटीन की आवश्यकता पूरी हो जाती है इस तरह कार्बोहाइड्रेट व प्रोटीन ग्रहण करने में संतुलन बनाना जरूरी होता है
                            युवाओं को आवश्यक ऊर्जा का तीसरा स्रोत है वसा या चर्बी जो हमे तेल , वनस्पति और घी से प्राप्त होता है जैसे गुड़ , शक्कर शुद्ध कार्बोहाइड्रेट है वैसे ही तेल या घी शुद्ध वसा है यह चर्बी शरीर में इंधन की तरह जलती है और एक ग्राम चर्बी नौ कैलोरी ऊर्जा देती है फिर ऐसा क्यों नहीं है की यदि हमें अधिक ऊर्जा चाहिए तो अधिक घी या तेल का सेवन करें ? दरअसल हमारे शरीर की बनावट ऐसी है की कार्बोहाइड्रेट हो या प्रोटीन या वसा जो भी अधिक मात्रा में होगा वह शरीर में विकार उत्पन्न करेगा अधिक चर्बी या तेल में तली चीजें खाने से ऊर्जा तो भरपूर मिल जाती है लेकिन चर्बी रक्त नलिकाओं की अंदरुनी सतह पर जम जाती है और ह्दय तक कम रक्त पहुँचता है आप जानते होंगे दिल के धड़कने के रक्त बहुत जरुरी है और यह अतिरिक्त चर्बी पेट , कमर व कूल्हों पर जमा हो जाती है बताइए कौन युवक या युवती अपने आपको मोटा या बदसूरत कहलाना पसंद करेगा ?

                               अब थोड़ी सी बात विटामिन और खनिज पदार्थो पर भी हमारे शरीर को सुचारू रूप से काम करने और संक्रामक रोगों से लड़ने के लिए विटामिनों की आवश्यकत होती है जैसे की आँखों के लिए विटामिन ए और त्वचा के लिए विटामिन सी और डी इत्यादि विटामिन बाढ़ प्रकार के होते है जो हमें दूध दही अंडे आदि के अलावा गाजर , पालक , धनिया, पुदीना ,टमाटर जैसी सब्जियों के अलावा आम,आंवला,पपीता,अमरूद ,संतरे जैसे फलों से प्राप्त होते है यहाँ तक कद्दू जैसे सब्जी में भी जिसे देखकर युवा नाक भौं सिकोड़ते है भरपूर विटामिन होता है सर्वाधिक विटामिन व् खनिज मौसमी फलों में पाए जाते है इसलिए हर मौसम में उपलब्ध फल खाने चाहिए यह सस्ते भी होते है और हर जगह मिल जाते है
                        खनिज पदार्थो में रक्त संचालन के लिए नमक बहुत आवश्यक है दांतों व हड्डियों की मजबूती के लिए कैल्शियम तथा रक्त में लाल कण व  नई कोशिकाएं बनने के लिए आयरन की आवश्यकता होती है यह तत्व हरी - पत्तेदार सब्जियों के अलावा अंकुरित अनाजों ,किशमिश व खजूर में पाया जाता है
                             किशमिश व् खजूर न भी मिलें तो अंकुरित अनाज तो हम रोज ही खा सकते है वैसे भी सुंदर घने व काले बालों के लिए अंकुरित अनाज खाना चाहिए
                            तात्पर्य है की यदि हम अपने भोजन में इन सब पदार्थो को संतुलित मात्रा में ग्रहण करे तो हमें न किसी टॉनिक की आवश्यकता होगी न किसी स्वास्थ्यवर्धक पेय या दवा की ऐसा भी नहीं की युवास्था में ऊर्जा प्राप्त करने के लिए हमें मंहगे भोजन या मंहगे फलो या सोखे मेवों की जरूरत हो बहुत सारे सस्ते और सहज उपलब्ध खाद्द पादर्थ मंहगे पदार्थो का विकल्प है जैसे की बादाम का विकल्प मूंगफल्ली
                               यह याद रखे की कार्बोहाइड्रेट , प्रोटीन, वसा की हमारे शरीर में क्या भूमिका है और हमे उन्हें कितनी मात्रा में लेना है

                               और हां ... भोजन के साथ पानी पीना न भूलें इसलिए क्योंकि हमारे शरीर का दो-तिहाई भाग तो पानी से ही बना है शरीर के तत्वों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए तथा शरीर के तापमान को नियंत्रित रखने के लिए पानी पीना बहुत जरुरी है इसलिए खूब पानी पियें लिकिन दूषित नहीं बल्कि साफ करके या छानकर हमारे यहाँ कहावत भी है ना ... ' गुरु बनाओ जानकार और पानी पियो छानकर '         

ब्लॉगिंग की दुनिया में वापसी

प्रिय पाठकों ,

            सन 2011 नवम्बर में मैंने ब्लॉगिंग करना बंद
कर दिया था अब पूरे 6 साल बाद मैं अपने ब्लॉग *नन्हीं कोपल* को नये सिरे से शुरू करने जा रही हूँ ।

             इन बीते हुए सालों में मैंने एम .एससी (ह्यूमन डेवेलपमेंट) बी.एड ,पीजीडीसीए की डिग्री प्राप्त की है ।
             मैं अपने लेखनी के माध्यम से पाठकों को ऐसी जानकारियां देना चाहती हूँ जो सभी पाठकगण के लिए उपयोगी व ज्ञानवर्धक हो , आशा है सभी पाठकों को यह
प्रयास पसंद आयेगा ।



*कोपल कोकास*