जिदंगी की किताब के पन्नो में रिश्तों के खूबसूरत लम्हें


मै कोपल कोकास 
मेरे लिए क्या हर व्यक्ति के लिए जिदंगी बहुत खूबसूरत है जिदंगी एक किताब की तरह है जिसमें कई खूबसूरत पन्ने है । हर पन्ने को खुदा एक एक करके खोलेगा आपकी जिदंगी की किताब सें आप तो बस उन् पन्नों के खुलना इतंजार कीजिये और खूबसूरत लम्हे का लुत्फ उठाइये जिदंगी भी खूबसूरत है और हमारे रिश्तें भी हम चाहे किसी भी मुश्किल में हो हमारे अपने और हमारे दोस्त ही काम आते है । इस सफर में कई मोड़ आते है चाहे वो बचपन हो , जवानी , या बुढ़ापा जिदंगी का हर मोड़ खूबसूरत है । 
मै और मेरी प्यारी दोस्त डौली 
इस जिदंगी में कई मुश्किले आती है पर उन मुश्किलों के साथ उनका हल भी आता है एक व्यक्ति इसे कैसे समझता है ये उसकी समझ पर निर्भर करता है । लोगों सवाल किया जाये कि वो कौन सी उमर दोबारा जीना चाहेंगे हर व्यक्ति का जवाब होगा बचपन क्योंकि इस बचपन में ना जाने कितनी शरारतें कितनी छूट , कितनी मस्ती भरी होती है । जो वापस नहीं आती है वैसे तो हर उमर वापस नहीं आती ।
मै और मेरी चाची श्वेता 
              एक बार बीत गयी तो बस यादों में रह जाती है । चाहे वो कोई भी उमर हो वो अपनी यादे दिल कैद कर ही जाती है ।  जिदंगी के इन खूबसूरत लम्हों को नाजाने कितने लोगों के साथ बिताते है परिवार के साथ , स्कूल के दोस्तों के साथ , दोस्तों के साथ , रिश्तेदारों के साथ , कई लोगों के साथ हर लम्हा बेशकीमती होता है । जो लोग आपको बहुत अच्छे लगते है या जिनका साथ आपको बहुत अच्छा लगता है वे लम्हे बस यादें नहीं होते है वे हमारे लिए बहुत खास होते है । ना जाने कितने एहसास जगह बनाते जाते है रिश्तों की खूबसूरती बढ़्ती जाती है । जब आप रिश्तों को खूबसूरत बनायेंगे तो उनके दिल में आपके एक खास जगह बन जायेगी ।
               हम रिश्तों को बहुत मानते है पर कभी कभी हमारे लिए हमारे अपने ही हमें पराये लगने लगते है ये तो व्यक्ति की सोच और हालात है जो उसे उसके अपनो से दूर करती है रिश्तों में दूरी मत बढ़ाइये वरना इन रिश्तों की खूबसूरती कम हो जायेगी । व्यक्ति किसी भी उमर का हो या किसी भी धर्म या किसी भी संस्कृति का हो सबका रिश्तो को देखने का रिश्तों को जीने का नजरिया अलग अलग होता है।  हर उमर ना जाने कितनी मस्ती भरी मिठास लाती है । बस आप उन रिश्तों में अपने प्यार की मिठास से अपने इन रिश्तों खूबसूरत बनाते जाइये । 
             
मै मेरे मम्मी पापा 
  हर रिश्ता और हर लम्हा बेशकीमती है मेरे लिए मेरे अपनो से बढ़्कर और क्या इस खूबसूरत जिदंगी में कुछ नही । जिदंगी के प्यारे और खूबसूरत सफर में अभी कई मुकाम आयेंगे बस आप इंतजार किजिये क्योंकि इंतजार का फल मीठा होता है । ज्यादा सोचिये मत क्योंकि ज्यादा सोचना अच्छा नहीं होता है । जिदंगी के हर लम्हे को अपने रिश्तों के साथ जी लीजिये । मै तो अपने रिश्तो को दिल से जीती और बहुत प्यार करती हूँ अपने रिश्तों से अपनी जिदंगी से इससे बढ़्कर और जिदंगी में है और क्या इन रिश्तों के सिवा पैसा , नाम , शोहरत भी रिश्तों के बाद ही आता है । रिश्तों में अपने प्यार की मिठास घोलते जाइये फिर देखिये जादू आपके रिश्ते और मीठे और खूबसूरत होते जायेगें । सलाम है मेरा इन खूबसूरर रिश्तों को । 

बचपन

बचपन के दिन बहुत ही प्यारे होते है न कोई फिक्र होती है न कोई चिंता होती है कहते है बच्चे कच्ची मिट्टी के समान होते है उन्हे जिस रुप में ढालो वे ढल जाते है । चैन से खेलने , खाने , मस्ती करने , धमा चौकडी मचाने की उमर होती है । ये एक ऐसी उमर है जो बीत जाये तो फिर नही दुबारा हाथ आती । हर व्यक्ति एक बार अपना बचपन जरुर जीना चाहता है । आज बाल दिवस है । बच्चे किसे प्यारे नहीं होते है । बचपन के दिन पंख लगाकर तेजी से आते है उतनी ही तेजी से गुजर जाते है ।
बचपन के दिन वाकई बहुत खूबसूरत और यादगार होते है । बेशकीमती होते है इन्हे सहेज कर रखिये कही खो ना जाये बच्चे । कल ये बच्चे ही जीवन की , समाज की , घर परिवार की एक नयी तस्वीर बनायेंगे । आज बहुत दुख होता है , जब देखते है कि छोटे छोटे बच्चे अपने नन्हे नन्हे हाथों से नाजाने ऐसे ऐसे काम कर रहे है जिनके बारे में हम सोच भी नहीं सकते है ।
आये दिन अखबार कितनी खबरों से सामना होते है जो सिर्फ बच्चो पर होती है बच्चो के साथ ये काम किया गया , उन्हें मारा पिटा गया , उन पर अत्याचार किया गया और ना जाने क्या क्या । तब बहुत दुख होता है कि क्या ये है हमारे देश की तस्वीर । हम अपनी प्रक़ृति को ,देश को हर बेशकीमती चीज को बचा सकते है तो फिर बच्चो पर हो जुर्म को क्यों नहीं रोक सकते है । हम भी तो कभी बच्चे थे तो हमें मिलकर ही इन्ही चीजों को रोकना होगा । वरना आने वाले वर्षो में हमारे समाज की देश की जो तस्वीर होगी वो कल्पना से भिन्न होगी । आज बाल दिवस पर आप सभी को बाल दिवस की शुभकामनायें ।
बच्चे
घर परिवार की शान होते है बच्चे ।
हर पहचान की शान होते है बच्चे ।
हर इंसान की शान होते है बच्चे ।
देश की ,समाज की ,शान होते है बच्चे ।
मासूमियत से ,चुलबुलाहट से ,मस्ती से
प्रेम से , उमंग से , बचपन की शान होते है बच्चे
लड़का हो या लड़की माता पिता की जान होते है बच्चे ।
जीने की संग रहने की हर बात की तालीम देते है बच्चे ।
माता पिता की आँखो का तारा होते है बच्चे ।
हर रुप प्यारे लगते है बच्चे ।
चाहे बुरे हो या भले हर इंसान की चाहत होते है बच्चे ।
बड़े प्यारे होते है बच्चे ।

बारिश का मौसम

बारिश का इंतजार वैसे तो सबको होता है पर सबसे ज्यादा उसे होता है जिसे बारिश और बारिश का मौसम दोनों ही पसंद हो । मुझे भी बारिश बेहद पसंद है बारिश में भीगना फुहारों के साथ मस्ती करना उन फुहारों से खुद को भीगाना पानी में छप छप करना पानी में नाव तैराना । सबसे ज्यादा तो तब भीगती जब मैं स्कूल से घर वापस आती थी तब मुझे बारिश उतनी पसंद नही थी जितनी की बेहद पसंद आती है उस वक्त मेरे पास मेरे घर में छत नही थी पर आज है तो मैं अपनी छत पर जाकर खूब भीगती हूँ मस्ती करती हूँ मेरे कमरे से ही छत पर जाने का रास्ता है मेरे घर में दो छत है एक बड़ी एक छोटी मैं दोनो पर जाकर मस्ती करती हूँ ।
पहले मुझे बारिश इसलिये पसंद नहीं थी क्योंकि मैनें अपने दादा जी और दादी माँ को अगस्त माह की बारिश में ही खोया था इसलिए उस वक्त बारिश से नफरत होती थी पर अब नहीं होती । आज बारिश में भीगते हुए कहीं भी जाने में बड़ा मजा आता है बारिश में भुट्टा पकौड़े चने चपटे खाने का अलग ही मजा है । हर मौसम की बात अलग होती है पर बात जहाँ बात बारिश के मौसम की हो वहाँ तो मजा ही मजा है । बारिश में ही ना जाने कितने फूल पत्तियाँ फल कलियाँ उगती होगी वैसे एक बागवान या माली बागवानी के लिए बारिश उत्तम मौसम और कोई नहीं मानता होगा। खेत के किसान खेती के लिए इन्द्र देवता से कितनी प्राथनायें करते होगें हे भगवान बारिश कर दें । उनकी बारिश से ना जाने कितनी उम्मीदें आशाऐं जुड़ी हुई होगीं । वो कहतें है ना आशा से आकाश थमा है ।
बारिश के गानों का भी अलग ही मजा है उन गानों में ना जाने कितनी मधुरता होती है कि वे गाने बारिश में भीगने को मजबूर कर देते है । मुझे भी बारिश के गाने अच्छे लगते है । बारिश से जाने कितनी दुख औए सुख जुड़े होगें कितनो को बारिश पसंद होगी कितनो को नापसंद । कितने ही लोग घर के अंदर बैठकर पकौड़े खाते चाय की चुस्कियों और टीवी कोई मूवी देखते हुए बारिश का लुत्फ उठाते है और कितने बाहर बारिश में भीगतें हुए सैर करते हुए मस्ती करते हुए लुत्फ उठाते होगें । सबके बारिश के मजे अलग अलग है । कालेज जाते समय छाते के साथ जाने में बड़ा मजा आता है छत में थोड़ा बहुत तो भीग जाते है पर जब छत हवा में उड जाये तब भीगने का सही मायने में मजा आता है ।
आज जब भी भीगकर आती हूँ तो मैं माँ की ना जाने कितनी ही हिदायतें सुनने को मुफ्त में मिल जाती है बेटी जल्दी कपडे बदल लें ठंड लग जायेगी जल्दी सिर पोछो सर्दी लग जायेंगी जब जब बारिश का मौसम आता है तब तब माँ की हिदायतों की पोटली खुल जाती है । माँ सुनाती है पर भीगने के बाद सुनता कौन है जो होना होगा वो तो होगा ही । इस बारिश के मौसम का लुत्फ उठाईयें मजें कीजिये खुद को इस फुहारों से भीगा दीजिये । ऐसे मौसम साल भर देखने को नही मिलते है । बारिश को बच्चा बड़े बुजुर्ग सभी पसंद करते है । बारिश का सबसे ज्यादा मजा तो स्कूल के बच्चों को आता होगा क्योंकि उनके स्कूल शुरु होने पर ही बारिश का मौसम आता है । इस बारिश पर बारिश के पानी को बचाइये उसका प्रयोग कीजिये । बारिश का लुत्फ उठाइये जी भरके । खुशियों से भरा हो आपका बारिश का मौसम और बारिश के हर साथ अपने हर लम्हे को सजाइयें ।

मेरे प्यारे दादा जी और मेरी प्यारी दादी माँ



मेरे दादाजी श्री जगमोहन कोकास और मेरी दादी माँ श्रीमती शीला कोकास भंडारा ( महाराष्ट ) में रहते थे । मैनें अपने दादा जी और दादी माँ के साथ अपनी जिदंगी के बहुत खूबसूरत और यादगार लम्हे गुजारे है उन लम्हो को मैं आप लोगों के साथ यहाँ आज बाँटना चाहूँगी । हम ज्यादातर गर्मी की छुट्टियों में होली दिवाली में ही भंडारा जाते थे क्योंकि मेरे पापा श्री शरद कोकास बैंक में नौकरी करते थे और मेरी मम्मी श्रीमती लता कोकास स्कूल में पढ़ाने जाती थी और हम स्कूल जाती थी तो हमें छुटटी नहीं मिल पाती थी इसलिए हम त्योहारो पर या जब छुट्टी मिलती थी तब जाते थे । हमारे दादा जी और दादी माँ को हमारे आने का बेसब्री से आने का इंतजार होता था । वे बार बार घडी देखते रहते थे हम वहाँ जाकर सबसे मिलते थे बहुत अच्छा लगता था । शाम को मैं कभी दादा जी के साथ घूमने जाती थी तो कभी दादी माँ के साथ । हमारे घर के पीछे रेत का मैदान हुआ करता था मेरी दादी माँ मोहल्ले के बच्चों को उन बच्चों मैं यानि कोपल , हमारी सहेली मोनिका ,दीपिका ,शिल्पा रानी , प्रतीक , निखिल, हनी को रेत पर खिलाने ले जाती । हम रेत पर कभी मंदिर बनाते तो कभी कोई घर बनाते थे । बनाते बनाते सारे बच्चे दादी माँ से ढेर सारी बातें भी करते जाते । भागा दौडी मचती तो दादी माँ चिलाती कि कहीं कोई गिर ना जाये । सारे बच्चे हमारी दादी माँ को दादी माँ कहते थे । जब खेलना हो जाता था तो सब दादी माँ से कहते दादी माँ अब घर जाना है । फिर दादी माँ सबको सबके घर छोड़्ती उसके बाद हम दादी माँ मोनिका दीपिका घर आ जाते । मोनिका दीपिका हमारे किरायेदार श्री अनिल सारवे और श्रीमती विजयालक्ष्मी सारवे की प्यारी प्यारी बेटियाँ है वे भंडारा में ही पैदा हुई और पली बढ़ी इसलिए वे मुझसे और दादा जी दादी माँ से बहुत ही अटूट रिश्ते से जुडी हुई है । हमने उन्हे कभी अपना किरायेदार नहीं समझा बल्कि अपने परिवार का सदस्य ही समझा । घर आकर हम मोनिका दीपिका को या तो पढ़ाने लग जाती या उनके साथ खेलने लग जाती । इधर दादी माँ और मम्मी खाने की तैयारी में लग जाते वहाँ आँटी खाने की तैयारी में लग जाती । हमारे दरवाजे पीछे से जुड़े हुये थे इसलिए हमारा आना जाना और आसान था । हम दिनभर खेलते रहते थे मेरे पास एक पेटी थी जिसमें बहुत सारा खेलने का सामान होता था । मेरे पास बहुत सारी कपड़े की गुड़ियाँ थी उसे हम मोनिका के साथ मिलकर सजाते थे कभी उसके लिए हार बनाते थे तो कभी कुछ कभी फूलों से उसका गजरा बनाते थे उसका मेकअप किट बनाते थे गुड्डे गुडिया की शादी करते पर इन सब में हमारी दादी माँ हमारे साथ होती थी कभी हम घराती बन जाते तो कभी मोनिका बराती शानदार तरीके से सारी रस्में निभाते शादी होती खाना होता हम मिलकर मडंप सजाते गाना बजाते बिदाई होती फिर दुल्हा दुल्हन का गृहप्रवेश होता रिस्पेशन होता और फिर हम और मोनिका एक हो जाते । दूल्हा दुल्हन के लिए झूला बनाते उस झूले को बहुत सारे फूले से सजाते उसमें उन्हे सुलाते । हम दादी माँ से पूछते जाते अब क्या करें । दादी माँ हमें सब बताती जाती हम करते जाते । कभी हम मेरी दादी माँ की पुरानी साडियाँ निकालकर पहनते थे एक दूसरे को सजाते सवांरते थे । दिन में जब सब सो जाते थे तो हम और मोनिका हमारे बगीचे में जाकर जाम तोड़्कर खाते थे जब जाम नहीं गिरते थे या नहीं निकलते थे तो हम पेड़ को धक्का लगाते या जोर जोर से हिलाते थे । जब जाम हाथ में आ जाते थे तो आराम से बैठकर खाते थे कभी हम आम वाले टोकने से कच्चे आम उठाकर खाते थे तो कभी नीबू तोड़्कर नीबू का शरबत बनाकर पीते तो कभी क्च्चे पापड़ निकालकर खाते थे । दादा जी हम काजू वाले बिस्किट खिलाते थे जो नमकीन होते थे । हम दादी माँ के हाथ के साबूदाने की खिचड़ी खाते तो कभी चावल और आम का अचार खाते आम का अचार तीखा होता तो हमें और मोनिका को मिर्ची लगती तो हम दादा जी के पास जाते और उनसे ठंडाई मांगकर खाते हमें ठंडाई खाने के लिए दादा जी बहुत मनाना पड़ता था वे हमें घुट्ने टेकने कर और हाथ आगे बढाने को कहते थे दादा जी पान के शौकिन थे तो वे पान में ( चमन बहार ) की ठंडाई डालते थे । वे पान खाते थे और हम इसका लाभ उठाते थे । अगर हम किसी त्योहार पर जाते तो मैं दादी माँ और मम्मी मिलकर ढेर सारे पकवान बनाते । उन पकवानों में पहले भगवान के लिए भोग निकाला जाता फिर हमें खाने मिलता । दिवाली पर हम कभी अपने दादा जी और चाचा के साथ खरीददारी करने जाती उस खरीददारी की लिस्ट बनती उसमें हमारें लिए सबसे पहले रंगोली लिखी जाती । जब सारा सामान आता तो सबसे पहले दादा जी हमें हमारी रंगोली देते । उसके बाद हम मोनिका के साथ मिलकर रंगोली डालते हमारा बहुत बड़ा आंगन था उसमें हम बहुत सारी रंगोलिया ड़ालते थे उसके बाद हाथ मुँह धोकर सुन्दर से कपडे पहनकर तैयार हो जाते तब तक मम्मी , दादी माँ , दादा जी और बबलू चाचा पूजा की तैयारी करते फिर शुभ मुहर्त के अनुसार दादा जी और सब मिलकर पूजा आरती करते फिर प्रसाद बँटता सब फटाखे छोड़्ते हमें फटाखों से डर लगता तो हम नहीं छोड्ते थे । फिर सबके साथ मिलकर हमारी सीमा बुआ के घर जाते जो वही भंडारा में ही रहती है । वहाँ सबसे मिलते फिर घर आकर खाना होता ढेर सारी बाते होती अगले दिन सुबह से हम और मोनिका तैयार होकर सबके घर प्रसाद बाँटने जाते । पहले हम होली नहीं खेलते थे सब खेलते थे और हम घर के अंदर छुपकर बैठ जाते क्योंकि हमें तब रंगों से डर लगता पर हम पिछ्ले एक साल से जी भरके होली खेलते अब हमें रंगों से कोई डर नहीं लगता । सन 2001 हमारी दादी माँ हमें छोड़कर चली गई तो हम दादा जी को अपने साथ अपने केलाबाडी वाले घर में ले आये और सन 2003 हमारे दादा जी भी हमें छोड़कर चले गये । अब तो बहुत कुछ बदल गया है अब हम भंडारा भी नहीं जा पाते या जानें का मन नहीं करता क्योंक़ि वहाँ जाने हमें दादी माँ और दादा जी बहुत याद सताती है अब हमारे किरायेदार श्री अनिल सारवे अपने परिवार को लेकर नागपुर में बस गये है और हमारी सहेली मोनिका अब यहाँ दुर्ग में अपनी नानी के यहाँ रहकर अपनी बारहवी की पढ़ाई कर रही है उससे भी कभी कभी मुलाकात हो जाती है । अब भंडारा वाले घर में हमारे चाचा जी श्री शेखर कोकास अपनी पत्नी श्रीमती रंजना कोकास और अपने बेटे पार्थ कोकास बिटिया पलक कोकास के साथ रहते है । वो वक्त के गुज़रे लम्हे और हमारे दादा जी दादी माँ हमारी यादों में रह गये है । अब ना वो प्यारे प्यार लम्हे मिलेंगे ना वो प्यारे प्यारे दादा जी और दादी माँ बस अगर हमारे पास कुछ है तो बस उनकी यादें है । “ जिदंगी के सफर में लोग चले जाते है और अपनी यादें दे जाते है । “ यादें बेशकीमती होती है इन्हे संभालकर रखिये और अपने से जुडें इंसानो और रिश्तों का सम्मान कीजिये ना जाने ये रिश्ते आपसे कब दूर हो जाये फिर आपको मिले या न मिलें । यही जिदंगी का फलसफा है कि इंसान चले जाते है और अपनी यादें छोड जाते है । हम सम्मान करते है अपने रिश्तों का आप भी करिये ।

बचपन में किन खिलौनों से खेलते थे आप ?

पोला आया ,खेल-खिलौनेवाला आया ,मिट्टी के खिलौने लाया


हर साल ’’ पोला ’’ पर्व के समय हमारे मोहल्ले में एक मिट्टी के खिलौने वाले अंकल निकलते थे । वे अंकल अक्सर दोपहरी के समय आते थे । जब वे आते थे तब हमारे मोह्ल्ले के बच्चे या तो अपनी पढ़ाई कर रहे होते या तो स्कूल से आकर भोजन कर आराम फरमा रहे होते थे । हमारी मम्मी हमें देखकर सोचती थी चलो अच्छा है ये थोड़ी सो जाये तो हम अपना कुछ काम निपटायें । बस खिलौने वाले अंकल का आना जब होता था तब अचानक हमारे घर पर मेरे साथियों मे से किसी कोई एक आता और कहता कि आंटी वो अपने मोहल्ले में खिलौने वाला आया है । फिर मैनें सुन लिया तो मैनें अपनी मम्मी से जिद की मुझे भी खिलौने दिलाओ ना सारे मोहल्ले के घरों पर यही दृश्य होता था कि हर बच्चा अपनी मम्मी के आगे पीछे तो उनका पल्लू थामे तो कभी उन्हे उनकी पसंद की चीज देकर उन्हे फुसलाता तो कभी मनाता कि मम्मी मुझे भी खिलौने दिलाओ ना मम्मी मैं थोड़ी देर खेलने के बाद अपना होमवर्क पूरा करुंगी या करुंगा जो भी हो मम्मी तो समझ ही जाती की ये सारे बहाने तो हर साल के है ( खिलौने लेने के लिए ) । आखिर इतनी मनुहार करने के बाद मम्मी मानी । उसके बाद जल्दी से मोहल्ले के सारे बच्चे अपनी अपनी मम्मियों व टोकनी को लेकर जिसमें हम बहुत सारे खिलौने लेगें वो टोकनी बड़ी होती है वहाँ जाते है जहाँ खिलौने वाले अंकल आये हुये होते है । फिर हम वहाँ जाकर अपनी अपनी पसंद के खिलौने खरीदते है बहुत सारे खिलौने, हमारी मम्मियाँ खिलौने वाले अंकल से मोल भाव करती है और हम सोचते है चलो लाख मनुहार के बाद आखिर खिलौने मिलें तो सही । खिलौने लेनें के बाद पहले तो हम घर जाते है घर जाते ही मम्मी की कि इस बार घर पर ही खेलना अपने दोस्तों के साथ मत खेलना पर हम कहाँ मानने वाले है मम्मी अपने काम में इधर उधर हुई कि हमने खिलौने वाला टोकना उठाये और उनसे नज़रें चुराकर बचाकर चल दिये दोस्तों के साथ खेलने दोस्तो के घर ये खेल होते थे किसी कि छत पर या तो किसी के घर पर , हमने किसी को कड़ाही दिखाई किसी को चक्की किसी गिलास किसी को कुछ । कुछ देर प्रेमपूर्वक खेले फिर लड़ाईयाँ शुरु हुई इस मारपिट में खिलौने तोड़े गये। किसी को कुछ मारा फेंका और रो धोकर खेल खत्मकर वापस अपने टोकने उठाकर चल दिये अपने घरों की ओर फिर घर पहुँचकर मम्मी की डाँट सुनी टोकने जगह पर रखे गए । मम्मी से बार बार कहा कि अब लड़ाई नहीं करना । मम्मी ने फिर से हिदायतें दी की कल मत जाना पर हमने नहीं सुनी । कल फिर खिलौने वाला टोकना उठाया और । खा पीकर निकल गए अपने दोस्तों के साथ खेलने बिना इस बात की फिक्र किये कि घर जाने पर मम्मी से डाँट पड़ेगी ।
कभी मैं अपने दोस्तो को अपने घर पर बुलाती खेलने के लिए कभी मैं जाती । मेरे उस ग्रुप में लड़के व लड़कियाँ भी शामिल थे । कुछ तो भाई बहन भी थे वे भाई बहन आपस में लड़ते झगड़ते ,रुठते मनाते फिर खेलने लग जाते बड़ा प्यारा लगता उनका यह प्यारा सा अनोखा सा रिश्ता । मेरे घर पर दोपहर के समय अक्सर बहुत सारे बच्चों की रोनक होती थी । मेरी मम्मी स्कूल पढ़ाने जाती थी और मैं घर पर रहती थी हम सारे बच्चे दिनभर खेलते मस्ती करते हम बच्चे इतना खेलते इतनी मस्ती करते कि शाम तक मेरे घर का नक्शा ही बदल जाता और जब मेरी शाम पाँच बजे स्कूल से घर आती तो पूछती कि आज कितना खेला क्या – क्या किया सब कुछ पूछती ।

आपको याद आये अपने बचपन के खेल ..? अंकल लोगों को भले याद न आये हों आंटियों को तो याद आ गये होंगे .. क्यों आंटी याद आया ?---आपकी कोपल

ये नेमप्लेट निकलती ही नहीं



मेरी बात पढ़ने से पहले पढ़िये पापा क्या कहते हैं
केलाबाड़ी उस मोहल्ले का नाम है जहाँ मैने अपनी नौकरी के शुरुआती दिन बिताये पत्नी और बिटिया कोपल के साथ । बेटी वहीं पैदा हुई और वहीं उसने होश सम्भाला । यह वह इलाका है राजनीतिक भाषा में जिसे सम्वेदनशील इलाका कहा जाता है । लेकिन प्यार की चाहत से भरा बचपन न मज़हब की दीवारों को समझता है न राजनीति को । कोपल ने जहाँ अपना बचपन बिताया उ घर को उस मोहल्ले को और वहाँ के नाना नानी ,दादा दादी ,चच्चा-चच्ची ,खाला, फूफी और बाज़ी को वह उसी तरह याद करती है जैसे कोई अपने घर के लोगों को याद करता है ।यहाँ जो कुछ उसने लिखा है अपनी भाषा में ,उसके शब्दों पर या वाक्य विन्यास पर न जायें, उसका निहितार्थ समझने की कोशिश करें । कभी कभी बच्चे भी बड़ों को बहुत कुछ सिखाते है -आपका- शरद कोकास

मेरा प्यारा मोहल्ला
’ एक इंसा
न मोहल्ले को बनाता है और मोहल्ला इंसान को बनाता है या कहलें मोहल्ला इंसान की पूरी दुनिया होता है और पूरी दुनिया ही एक मोहल्ला है

दोनों बातें मिलकर तो एक ही मतलब होता है मोहल्ला ,मोहल्ला वह जगह है जहाँ हम पलते हैं,बढ़ते हैं , पढ़ते-लिखते हैं और कुछ बनते हैं, आगे बढ़ते हैं और हम में से कुछ ऐसे होते है जो कुछ समय के बाद उस जगह से हमेशा के लिये अलग हो जाते हैं । आज भी उस मोहल्ले की खूबसूरत यादें मेरे साथ हैं मेरे पास हैं मेरे उस मोहल्ले की प्यारी प्यारी, मीठी मीठी यादों को मैं आज यहाँ आप के संग बांटना चाहूँगी । मेरा बहुत प्यारा सा मोहल्ला है । ये बात और है कि वो मोहल्ला वहीं पर् है पर अब मैं वहाँ नहीं हूँ । मेरे उस मोहल्ले का नाम है केलाबाडी । मै‘’इनायतविला‘’ में यानि नबाब अंकल के उस प्यारे से घर में ही पैदा हुई । इस घर का नाम नानाजी श्री हाजी इनायत ल्लाह यानि नबा अंकल के अब्बा जी के नाम से है। इस पते के नाम से ही मेरे इस घर में भी चिट्ठियाँ आती है । उस घर में ही पली बढ़ी, पढना, लिखना ,चलना, खेलना, कूदना, खाना खाना,बोलना,दोस्त बनाना,रिश्तों को बनाना, समझना और खुद को जाना अपनों को समझा और बहुत कुछ सीखा । ये घर हमेशा मेरे दिल के करीब रहा है और हमेशा रहेगा । वो घर मेरा अपना प्यारा सा घर है। उस घर और मोहल्ले से मेरी बहुत सारी खटटी मीठी और प्यारी प्यारी यादें जुडी है । इन यादों ने मुझे अभी तक उस घर से जोडकर रखा है । हम किराये के एक छोटे से घर में रहते थे । पर पता नहीं उस घर में ऐसा क्या था जो आज तक उस घर से लगाव है। आज भी उस घर में रहने की हसरत है । हमारा तीन कमरों का प्यारा सा घर था । मैनें अपने उस घर में सत्रह साल बिताये एक व्यक्ति के लिये इससे प्यारी बात और क्या हो सकती है कि उसने एक किराये घर में पूरे सत्रह साल बिताये। किसी के लिए सत्रह साल एक जगह पर रहना या बिताना मामूली बात नहीं है । मै आज भी उस मोहल्ले से हर रुप से जुडी हुई हूँ । हमारे मकान मालिक जो ऊपर की मंज़िल पर रहते है श्री हाजी इनायत उल्लाह ।उनके घर मैं उनकी पत्नी शम्सुन्निसा उनके बेटे अब्दुल अज़ीज़ खान , बहू शमीम और तीन पोते रहते हैं। लतीफ सबसे बडे ,रफीक मँझले और शफीक सबसे छोटे ।आज मेरे इन प्यारे प्यारे भाईयो की शादी हो गई है लतीफ भैया की पत्नी का नाम असमा है । भैया भाभी की दो प्यारी बेटियाँ है आयशा सबसे बडी और अज़मा सबसे छोटी । रफीक भैया की पत्नी का नाम नाजनीन है भैया भाभी की एक प्यारी सी बेटी है आरुष । शफीक भैया की पत्नी का नाम बुशरा है ।इन भैया भाभी के दो प्यारे से बेटे अम्मार और अबदुल्ला । ये सभी मुझे बहुत प्यार करते है । आंटी अंकल मुझसे सबसे ज्यादा प्यार करते है क्योंकि उनकी कोई बेटी नहीं है इसलिए वे मुझे अपनी बेटी से बढकर प्यार करते है । मैं अपने आंटी अंकल की प्यारी सी बेटी हूँ । मेरे लिए यही मेरी जिदंगी के सबसे सच्चे ज़रुरी और प्यारे रिश्ते हैं जिन्हे मैनें सबसे पहली बार अपनी से आँखों देखा और बडे होने पर महसूस किया । इन रिश्तों से अलग होकर रहना मेरे लिये आसान नहीं है । आज वहाँ का माहौल बहुत बदल गया है । आज मैं हमारे खुद के घर में रहती हूँ पर उस घर में आज मेरी प्यारी सी याद के रुप पापा के नाम की नेमप्लेट लगी है । जिसे नबाब अंकल निकालना नही चाहते । उस नेमप्लेट को मैनें कई बार निकालने की कोशिश की पर थककर हार गई पर वो नेमप्लेट नहीं निकली उसके बाद मैं समझ गई कि वो अब पक्की हो गई है । मतलब यह है कि मैं तो वहाँ से चली गई पर अब भी वो मुझे वहाँ से जाने नहीं देना चाहती है । मैं जब भी वहाँ जाती हूँ तो उस नेमप्लेट को देखती ज़रुर हूँ । देखना अच्छा तो नहीं लगता पर वहाँ नजर चली ही जाती है मै भी उस नेमप्लेट को निकालना नहीं चाहती ।

यहाँ जो तस्वीर है उसमें नवाब चचा मेरे घर में अपने नन्हे नाती-पोतों के साथ बैठे हैं । और दूसरी तस्वीर उस घर की और वहाँ के लोगों की है ,हम लोग नीचे रहते थे जहाँ पापा के नाम की नेमप्लेट लगी है .आपको नेम प्लेट दिखी या नही? मुझे ज़रूर बताईये और यह भी कि उसमें किसका नाम है । आज बस इतना ही, आगे की स्टोरी बाद में - आपकी कोपल


मेरा पहला ई-मेल

मैने अपना पहला इ-मेल ,मतलब अपने जीवन का पहला इ-मेल शब्दों का सफर वाले अजित वडनेरकर अंकल को भेजा है क्या लिखा है आप खुद ही पढ लें...
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Kopal Kokas

to wadnerkar.ajit
show details Jun 2 (7 days ago)
Reply

Follow up message
अजित अंकल अभी अभी मैंने अपना ईमेल नया आई डी बनाया है और जीवन में पहली बार किसी को ईमेल भेज रही हूँ वो आप है जिसे मैंने ईमेल भेजा है मैं आपका ब्लॉग शब्दों का सफ़र पढ़ती हूँ मुझे आपके ब्लॉग मे रेत का टीला बहुत पसंद आया कुछ अलग सा लगा आपकी वो कविता भी बहुत अच्छी लगी जिसमे बानी का नाम है ..... कोस कोस पर बदले पानी कोस कोस पर बानीयह किरदार प्राची देसाई ने कसम से में जो पहले जी टी वी पर आता था पर निभाया है पापा के साथ मे आपको उनकी फेस बुक पर भी देखती हूँ मुझे जबाब दीजियेगा मैंने कुछ दिनों पहले ही अपना एक ब्लॉग बनाया है http:// nanhikopal.blogspoat.com और जल्द ही कुछ नया करुगी मे फर्स्ट ईयर मे पढ़ रही हूँ
कोपल कोकास
फिर मालूम अजित अंकल का क्या जवाब आया॥? यह भी पढ लीजिये..

अजित वडनेरकर

to me
show details Jun 3 (7 days ago)
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Follow up message
सुप्रिय कोपल,
शुभाशीष...तुम्हारी चिट्ठी पाकर अच्छा लगा। तुमने अपना मेल आईडी बना लिया है यह बहुत अच्छी बात है। इस पर पहली चिट्ठी मुझे लिखी गई ये मेरे लिए गर्व की बात है
ये ज़माना तकनीक का है इसलिए अब ई-पत्र भेजे जाते हैं। मगर हमारी सभ्यता के विकास में पत्राचार का बड़ा महत्व रहा है। प्राचीनकाल से लेकर अभी कुछ वर्षों पूर्व तक संदेशवाहक यानी डाकिया बहुत महत्वपूर्ण होता था। उसका इंतजार बेसब्री से होता था। एक चिट्ठी जो आज इलेक्ट्रानिक संकेत में बदल कर पलक झपकते कहीं से कहीं पहुंच जाती है, कुछ साल पहले तक उसके इंतजार के लिए शाम होते ही आधी दुनिया घर की चौखट पर खड़ी हो कर डाकिये की राह देखा करती थी। सो तुमने पत्राचार शुरु करने की पहल कर दी है,यह अच्छी बात है। ज्ञान की साझेदारी के विभिन्न माध्यमों में पत्राचार भी बहुत महत्वपूर्ण है।
चिट्ठियां अपने समय का जीवित इतिहास होती हैं। इन्हें सहेज कर इसीलिए रखा जाता है। आज जो इतिहास हम पढ़ते हैं उनमें न जाने कितना हिस्सा सिर्फ चिट्ठियों में लिखे गए तथ्यों पर आधारित है जो राजलेखागारों में सुरक्षित हैं। ये विभिन्न भाषाओं में लिखे गए थे और इन्हें पढ़ने-समझने में विद्वानों ने अपना कीमती समय लगाया ताकी आनेवाली पीढ़ियां अपना गुज़रा कल जान सकें और इस तरह अतीत की कड़ियों से जुड़ कर मज़बूत वर्तमान बन सके।

तुम सोच रही होगी कि मैने क्या व्याख्यान शुरु कर दिया। मेरी आदत ही ऐसी है। जहां मौका मिला, व्याख्यान शुरू। अध्यापक बनना चाहता था , पर बन गया पत्रकार क्योकि इसका अवसर जल्दी मिला। तुमने ब्लाग बनाया है, मगर खुला नहीं उसकी जगह एक चीनी साईट खुल रही है। उसका स्नैपशाट यहां दे रहा हूं। ब्लागिंग खुद को अभिव्यक्ति करने का अच्छा जरिया है। पत्राचार भी नियमित करो। हाय-हलो वाले आज के दौर के पत्राचार से हटकर इस विधा में लेखन की सार्थकता तलाश करोगी तो हमें खुशी होगी। पत्राचार भी साहित्यिक विधा है। मगर पाक कला की तरह इसे भी विधा न मान कर घर की मुर्गी समझा जाता है
सस्नेह
अजित
कितना अच्छा पत्र है ना ? आप सब एक दूसरे को पत्र लिखें मेरे पापा तो सब साहित्यकारों को पत्र लिखते हैं..वो भी पोस्ट्कार्ड उनकी एक पत्रों की किताब भी है।हाँ एक बात और यह टेम्प्लेट बदलने के चक्कर मे अंकल की प्यारी प्यारी फोटो गुम गई इसे फिर से लगा दीजिये ना अंकल और रावेन्द्रकुमार रावि अंकल आप भी,और बाकी अंकल भी.. आपकी कोपल