जिदंगी की किताब के पन्नो में रिश्तों के खूबसूरत लम्हें


मै कोपल कोकास 
मेरे लिए क्या हर व्यक्ति के लिए जिदंगी बहुत खूबसूरत है जिदंगी एक किताब की तरह है जिसमें कई खूबसूरत पन्ने है । हर पन्ने को खुदा एक एक करके खोलेगा आपकी जिदंगी की किताब सें आप तो बस उन् पन्नों के खुलना इतंजार कीजिये और खूबसूरत लम्हे का लुत्फ उठाइये जिदंगी भी खूबसूरत है और हमारे रिश्तें भी हम चाहे किसी भी मुश्किल में हो हमारे अपने और हमारे दोस्त ही काम आते है । इस सफर में कई मोड़ आते है चाहे वो बचपन हो , जवानी , या बुढ़ापा जिदंगी का हर मोड़ खूबसूरत है । 
मै और मेरी प्यारी दोस्त डौली 
इस जिदंगी में कई मुश्किले आती है पर उन मुश्किलों के साथ उनका हल भी आता है एक व्यक्ति इसे कैसे समझता है ये उसकी समझ पर निर्भर करता है । लोगों सवाल किया जाये कि वो कौन सी उमर दोबारा जीना चाहेंगे हर व्यक्ति का जवाब होगा बचपन क्योंकि इस बचपन में ना जाने कितनी शरारतें कितनी छूट , कितनी मस्ती भरी होती है । जो वापस नहीं आती है वैसे तो हर उमर वापस नहीं आती ।
मै और मेरी चाची श्वेता 
              एक बार बीत गयी तो बस यादों में रह जाती है । चाहे वो कोई भी उमर हो वो अपनी यादे दिल कैद कर ही जाती है ।  जिदंगी के इन खूबसूरत लम्हों को नाजाने कितने लोगों के साथ बिताते है परिवार के साथ , स्कूल के दोस्तों के साथ , दोस्तों के साथ , रिश्तेदारों के साथ , कई लोगों के साथ हर लम्हा बेशकीमती होता है । जो लोग आपको बहुत अच्छे लगते है या जिनका साथ आपको बहुत अच्छा लगता है वे लम्हे बस यादें नहीं होते है वे हमारे लिए बहुत खास होते है । ना जाने कितने एहसास जगह बनाते जाते है रिश्तों की खूबसूरती बढ़्ती जाती है । जब आप रिश्तों को खूबसूरत बनायेंगे तो उनके दिल में आपके एक खास जगह बन जायेगी ।
               हम रिश्तों को बहुत मानते है पर कभी कभी हमारे लिए हमारे अपने ही हमें पराये लगने लगते है ये तो व्यक्ति की सोच और हालात है जो उसे उसके अपनो से दूर करती है रिश्तों में दूरी मत बढ़ाइये वरना इन रिश्तों की खूबसूरती कम हो जायेगी । व्यक्ति किसी भी उमर का हो या किसी भी धर्म या किसी भी संस्कृति का हो सबका रिश्तो को देखने का रिश्तों को जीने का नजरिया अलग अलग होता है।  हर उमर ना जाने कितनी मस्ती भरी मिठास लाती है । बस आप उन रिश्तों में अपने प्यार की मिठास से अपने इन रिश्तों खूबसूरत बनाते जाइये । 
             
मै मेरे मम्मी पापा 
  हर रिश्ता और हर लम्हा बेशकीमती है मेरे लिए मेरे अपनो से बढ़्कर और क्या इस खूबसूरत जिदंगी में कुछ नही । जिदंगी के प्यारे और खूबसूरत सफर में अभी कई मुकाम आयेंगे बस आप इंतजार किजिये क्योंकि इंतजार का फल मीठा होता है । ज्यादा सोचिये मत क्योंकि ज्यादा सोचना अच्छा नहीं होता है । जिदंगी के हर लम्हे को अपने रिश्तों के साथ जी लीजिये । मै तो अपने रिश्तो को दिल से जीती और बहुत प्यार करती हूँ अपने रिश्तों से अपनी जिदंगी से इससे बढ़्कर और जिदंगी में है और क्या इन रिश्तों के सिवा पैसा , नाम , शोहरत भी रिश्तों के बाद ही आता है । रिश्तों में अपने प्यार की मिठास घोलते जाइये फिर देखिये जादू आपके रिश्ते और मीठे और खूबसूरत होते जायेगें । सलाम है मेरा इन खूबसूरर रिश्तों को । 

बचपन

बचपन के दिन बहुत ही प्यारे होते है न कोई फिक्र होती है न कोई चिंता होती है कहते है बच्चे कच्ची मिट्टी के समान होते है उन्हे जिस रुप में ढालो वे ढल जाते है । चैन से खेलने , खाने , मस्ती करने , धमा चौकडी मचाने की उमर होती है । ये एक ऐसी उमर है जो बीत जाये तो फिर नही दुबारा हाथ आती । हर व्यक्ति एक बार अपना बचपन जरुर जीना चाहता है । आज बाल दिवस है । बच्चे किसे प्यारे नहीं होते है । बचपन के दिन पंख लगाकर तेजी से आते है उतनी ही तेजी से गुजर जाते है ।
बचपन के दिन वाकई बहुत खूबसूरत और यादगार होते है । बेशकीमती होते है इन्हे सहेज कर रखिये कही खो ना जाये बच्चे । कल ये बच्चे ही जीवन की , समाज की , घर परिवार की एक नयी तस्वीर बनायेंगे । आज बहुत दुख होता है , जब देखते है कि छोटे छोटे बच्चे अपने नन्हे नन्हे हाथों से नाजाने ऐसे ऐसे काम कर रहे है जिनके बारे में हम सोच भी नहीं सकते है ।
आये दिन अखबार कितनी खबरों से सामना होते है जो सिर्फ बच्चो पर होती है बच्चो के साथ ये काम किया गया , उन्हें मारा पिटा गया , उन पर अत्याचार किया गया और ना जाने क्या क्या । तब बहुत दुख होता है कि क्या ये है हमारे देश की तस्वीर । हम अपनी प्रक़ृति को ,देश को हर बेशकीमती चीज को बचा सकते है तो फिर बच्चो पर हो जुर्म को क्यों नहीं रोक सकते है । हम भी तो कभी बच्चे थे तो हमें मिलकर ही इन्ही चीजों को रोकना होगा । वरना आने वाले वर्षो में हमारे समाज की देश की जो तस्वीर होगी वो कल्पना से भिन्न होगी । आज बाल दिवस पर आप सभी को बाल दिवस की शुभकामनायें ।
बच्चे
घर परिवार की शान होते है बच्चे ।
हर पहचान की शान होते है बच्चे ।
हर इंसान की शान होते है बच्चे ।
देश की ,समाज की ,शान होते है बच्चे ।
मासूमियत से ,चुलबुलाहट से ,मस्ती से
प्रेम से , उमंग से , बचपन की शान होते है बच्चे
लड़का हो या लड़की माता पिता की जान होते है बच्चे ।
जीने की संग रहने की हर बात की तालीम देते है बच्चे ।
माता पिता की आँखो का तारा होते है बच्चे ।
हर रुप प्यारे लगते है बच्चे ।
चाहे बुरे हो या भले हर इंसान की चाहत होते है बच्चे ।
बड़े प्यारे होते है बच्चे ।

बारिश का मौसम

बारिश का इंतजार वैसे तो सबको होता है पर सबसे ज्यादा उसे होता है जिसे बारिश और बारिश का मौसम दोनों ही पसंद हो । मुझे भी बारिश बेहद पसंद है बारिश में भीगना फुहारों के साथ मस्ती करना उन फुहारों से खुद को भीगाना पानी में छप छप करना पानी में नाव तैराना । सबसे ज्यादा तो तब भीगती जब मैं स्कूल से घर वापस आती थी तब मुझे बारिश उतनी पसंद नही थी जितनी की बेहद पसंद आती है उस वक्त मेरे पास मेरे घर में छत नही थी पर आज है तो मैं अपनी छत पर जाकर खूब भीगती हूँ मस्ती करती हूँ मेरे कमरे से ही छत पर जाने का रास्ता है मेरे घर में दो छत है एक बड़ी एक छोटी मैं दोनो पर जाकर मस्ती करती हूँ ।
पहले मुझे बारिश इसलिये पसंद नहीं थी क्योंकि मैनें अपने दादा जी और दादी माँ को अगस्त माह की बारिश में ही खोया था इसलिए उस वक्त बारिश से नफरत होती थी पर अब नहीं होती । आज बारिश में भीगते हुए कहीं भी जाने में बड़ा मजा आता है बारिश में भुट्टा पकौड़े चने चपटे खाने का अलग ही मजा है । हर मौसम की बात अलग होती है पर बात जहाँ बात बारिश के मौसम की हो वहाँ तो मजा ही मजा है । बारिश में ही ना जाने कितने फूल पत्तियाँ फल कलियाँ उगती होगी वैसे एक बागवान या माली बागवानी के लिए बारिश उत्तम मौसम और कोई नहीं मानता होगा। खेत के किसान खेती के लिए इन्द्र देवता से कितनी प्राथनायें करते होगें हे भगवान बारिश कर दें । उनकी बारिश से ना जाने कितनी उम्मीदें आशाऐं जुड़ी हुई होगीं । वो कहतें है ना आशा से आकाश थमा है ।
बारिश के गानों का भी अलग ही मजा है उन गानों में ना जाने कितनी मधुरता होती है कि वे गाने बारिश में भीगने को मजबूर कर देते है । मुझे भी बारिश के गाने अच्छे लगते है । बारिश से जाने कितनी दुख औए सुख जुड़े होगें कितनो को बारिश पसंद होगी कितनो को नापसंद । कितने ही लोग घर के अंदर बैठकर पकौड़े खाते चाय की चुस्कियों और टीवी कोई मूवी देखते हुए बारिश का लुत्फ उठाते है और कितने बाहर बारिश में भीगतें हुए सैर करते हुए मस्ती करते हुए लुत्फ उठाते होगें । सबके बारिश के मजे अलग अलग है । कालेज जाते समय छाते के साथ जाने में बड़ा मजा आता है छत में थोड़ा बहुत तो भीग जाते है पर जब छत हवा में उड जाये तब भीगने का सही मायने में मजा आता है ।
आज जब भी भीगकर आती हूँ तो मैं माँ की ना जाने कितनी ही हिदायतें सुनने को मुफ्त में मिल जाती है बेटी जल्दी कपडे बदल लें ठंड लग जायेगी जल्दी सिर पोछो सर्दी लग जायेंगी जब जब बारिश का मौसम आता है तब तब माँ की हिदायतों की पोटली खुल जाती है । माँ सुनाती है पर भीगने के बाद सुनता कौन है जो होना होगा वो तो होगा ही । इस बारिश के मौसम का लुत्फ उठाईयें मजें कीजिये खुद को इस फुहारों से भीगा दीजिये । ऐसे मौसम साल भर देखने को नही मिलते है । बारिश को बच्चा बड़े बुजुर्ग सभी पसंद करते है । बारिश का सबसे ज्यादा मजा तो स्कूल के बच्चों को आता होगा क्योंकि उनके स्कूल शुरु होने पर ही बारिश का मौसम आता है । इस बारिश पर बारिश के पानी को बचाइये उसका प्रयोग कीजिये । बारिश का लुत्फ उठाइये जी भरके । खुशियों से भरा हो आपका बारिश का मौसम और बारिश के हर साथ अपने हर लम्हे को सजाइयें ।

मेरे प्यारे दादा जी और मेरी प्यारी दादी माँ



मेरे दादाजी श्री जगमोहन कोकास और मेरी दादी माँ श्रीमती शीला कोकास भंडारा ( महाराष्ट ) में रहते थे । मैनें अपने दादा जी और दादी माँ के साथ अपनी जिदंगी के बहुत खूबसूरत और यादगार लम्हे गुजारे है उन लम्हो को मैं आप लोगों के साथ यहाँ आज बाँटना चाहूँगी । हम ज्यादातर गर्मी की छुट्टियों में होली दिवाली में ही भंडारा जाते थे क्योंकि मेरे पापा श्री शरद कोकास बैंक में नौकरी करते थे और मेरी मम्मी श्रीमती लता कोकास स्कूल में पढ़ाने जाती थी और हम स्कूल जाती थी तो हमें छुटटी नहीं मिल पाती थी इसलिए हम त्योहारो पर या जब छुट्टी मिलती थी तब जाते थे । हमारे दादा जी और दादी माँ को हमारे आने का बेसब्री से आने का इंतजार होता था । वे बार बार घडी देखते रहते थे हम वहाँ जाकर सबसे मिलते थे बहुत अच्छा लगता था । शाम को मैं कभी दादा जी के साथ घूमने जाती थी तो कभी दादी माँ के साथ । हमारे घर के पीछे रेत का मैदान हुआ करता था मेरी दादी माँ मोहल्ले के बच्चों को उन बच्चों मैं यानि कोपल , हमारी सहेली मोनिका ,दीपिका ,शिल्पा रानी , प्रतीक , निखिल, हनी को रेत पर खिलाने ले जाती । हम रेत पर कभी मंदिर बनाते तो कभी कोई घर बनाते थे । बनाते बनाते सारे बच्चे दादी माँ से ढेर सारी बातें भी करते जाते । भागा दौडी मचती तो दादी माँ चिलाती कि कहीं कोई गिर ना जाये । सारे बच्चे हमारी दादी माँ को दादी माँ कहते थे । जब खेलना हो जाता था तो सब दादी माँ से कहते दादी माँ अब घर जाना है । फिर दादी माँ सबको सबके घर छोड़्ती उसके बाद हम दादी माँ मोनिका दीपिका घर आ जाते । मोनिका दीपिका हमारे किरायेदार श्री अनिल सारवे और श्रीमती विजयालक्ष्मी सारवे की प्यारी प्यारी बेटियाँ है वे भंडारा में ही पैदा हुई और पली बढ़ी इसलिए वे मुझसे और दादा जी दादी माँ से बहुत ही अटूट रिश्ते से जुडी हुई है । हमने उन्हे कभी अपना किरायेदार नहीं समझा बल्कि अपने परिवार का सदस्य ही समझा । घर आकर हम मोनिका दीपिका को या तो पढ़ाने लग जाती या उनके साथ खेलने लग जाती । इधर दादी माँ और मम्मी खाने की तैयारी में लग जाते वहाँ आँटी खाने की तैयारी में लग जाती । हमारे दरवाजे पीछे से जुड़े हुये थे इसलिए हमारा आना जाना और आसान था । हम दिनभर खेलते रहते थे मेरे पास एक पेटी थी जिसमें बहुत सारा खेलने का सामान होता था । मेरे पास बहुत सारी कपड़े की गुड़ियाँ थी उसे हम मोनिका के साथ मिलकर सजाते थे कभी उसके लिए हार बनाते थे तो कभी कुछ कभी फूलों से उसका गजरा बनाते थे उसका मेकअप किट बनाते थे गुड्डे गुडिया की शादी करते पर इन सब में हमारी दादी माँ हमारे साथ होती थी कभी हम घराती बन जाते तो कभी मोनिका बराती शानदार तरीके से सारी रस्में निभाते शादी होती खाना होता हम मिलकर मडंप सजाते गाना बजाते बिदाई होती फिर दुल्हा दुल्हन का गृहप्रवेश होता रिस्पेशन होता और फिर हम और मोनिका एक हो जाते । दूल्हा दुल्हन के लिए झूला बनाते उस झूले को बहुत सारे फूले से सजाते उसमें उन्हे सुलाते । हम दादी माँ से पूछते जाते अब क्या करें । दादी माँ हमें सब बताती जाती हम करते जाते । कभी हम मेरी दादी माँ की पुरानी साडियाँ निकालकर पहनते थे एक दूसरे को सजाते सवांरते थे । दिन में जब सब सो जाते थे तो हम और मोनिका हमारे बगीचे में जाकर जाम तोड़्कर खाते थे जब जाम नहीं गिरते थे या नहीं निकलते थे तो हम पेड़ को धक्का लगाते या जोर जोर से हिलाते थे । जब जाम हाथ में आ जाते थे तो आराम से बैठकर खाते थे कभी हम आम वाले टोकने से कच्चे आम उठाकर खाते थे तो कभी नीबू तोड़्कर नीबू का शरबत बनाकर पीते तो कभी क्च्चे पापड़ निकालकर खाते थे । दादा जी हम काजू वाले बिस्किट खिलाते थे जो नमकीन होते थे । हम दादी माँ के हाथ के साबूदाने की खिचड़ी खाते तो कभी चावल और आम का अचार खाते आम का अचार तीखा होता तो हमें और मोनिका को मिर्ची लगती तो हम दादा जी के पास जाते और उनसे ठंडाई मांगकर खाते हमें ठंडाई खाने के लिए दादा जी बहुत मनाना पड़ता था वे हमें घुट्ने टेकने कर और हाथ आगे बढाने को कहते थे दादा जी पान के शौकिन थे तो वे पान में ( चमन बहार ) की ठंडाई डालते थे । वे पान खाते थे और हम इसका लाभ उठाते थे । अगर हम किसी त्योहार पर जाते तो मैं दादी माँ और मम्मी मिलकर ढेर सारे पकवान बनाते । उन पकवानों में पहले भगवान के लिए भोग निकाला जाता फिर हमें खाने मिलता । दिवाली पर हम कभी अपने दादा जी और चाचा के साथ खरीददारी करने जाती उस खरीददारी की लिस्ट बनती उसमें हमारें लिए सबसे पहले रंगोली लिखी जाती । जब सारा सामान आता तो सबसे पहले दादा जी हमें हमारी रंगोली देते । उसके बाद हम मोनिका के साथ मिलकर रंगोली डालते हमारा बहुत बड़ा आंगन था उसमें हम बहुत सारी रंगोलिया ड़ालते थे उसके बाद हाथ मुँह धोकर सुन्दर से कपडे पहनकर तैयार हो जाते तब तक मम्मी , दादी माँ , दादा जी और बबलू चाचा पूजा की तैयारी करते फिर शुभ मुहर्त के अनुसार दादा जी और सब मिलकर पूजा आरती करते फिर प्रसाद बँटता सब फटाखे छोड़्ते हमें फटाखों से डर लगता तो हम नहीं छोड्ते थे । फिर सबके साथ मिलकर हमारी सीमा बुआ के घर जाते जो वही भंडारा में ही रहती है । वहाँ सबसे मिलते फिर घर आकर खाना होता ढेर सारी बाते होती अगले दिन सुबह से हम और मोनिका तैयार होकर सबके घर प्रसाद बाँटने जाते । पहले हम होली नहीं खेलते थे सब खेलते थे और हम घर के अंदर छुपकर बैठ जाते क्योंकि हमें तब रंगों से डर लगता पर हम पिछ्ले एक साल से जी भरके होली खेलते अब हमें रंगों से कोई डर नहीं लगता । सन 2001 हमारी दादी माँ हमें छोड़कर चली गई तो हम दादा जी को अपने साथ अपने केलाबाडी वाले घर में ले आये और सन 2003 हमारे दादा जी भी हमें छोड़कर चले गये । अब तो बहुत कुछ बदल गया है अब हम भंडारा भी नहीं जा पाते या जानें का मन नहीं करता क्योंक़ि वहाँ जाने हमें दादी माँ और दादा जी बहुत याद सताती है अब हमारे किरायेदार श्री अनिल सारवे अपने परिवार को लेकर नागपुर में बस गये है और हमारी सहेली मोनिका अब यहाँ दुर्ग में अपनी नानी के यहाँ रहकर अपनी बारहवी की पढ़ाई कर रही है उससे भी कभी कभी मुलाकात हो जाती है । अब भंडारा वाले घर में हमारे चाचा जी श्री शेखर कोकास अपनी पत्नी श्रीमती रंजना कोकास और अपने बेटे पार्थ कोकास बिटिया पलक कोकास के साथ रहते है । वो वक्त के गुज़रे लम्हे और हमारे दादा जी दादी माँ हमारी यादों में रह गये है । अब ना वो प्यारे प्यार लम्हे मिलेंगे ना वो प्यारे प्यारे दादा जी और दादी माँ बस अगर हमारे पास कुछ है तो बस उनकी यादें है । “ जिदंगी के सफर में लोग चले जाते है और अपनी यादें दे जाते है । “ यादें बेशकीमती होती है इन्हे संभालकर रखिये और अपने से जुडें इंसानो और रिश्तों का सम्मान कीजिये ना जाने ये रिश्ते आपसे कब दूर हो जाये फिर आपको मिले या न मिलें । यही जिदंगी का फलसफा है कि इंसान चले जाते है और अपनी यादें छोड जाते है । हम सम्मान करते है अपने रिश्तों का आप भी करिये ।

मुम्बई बहुत ही खूबसूरत जगह है

हम बहुत दिनों से मुम्बई घूमने का प्रोग्राम बना रहे थे । हमारी पहचान नेट पर श्वेता चाची से हुई हम लोग मेल मित्र बने और उन्होने हमें मुम्बई आने के लिए आमंत्रित किया । मुम्बई जैसी जगह पर किसी का अपने घर आमंत्रित करना बहुत बड़ी होती है । 23 दिसंबर को सुबह तीन बजे हम लोग गीतांजली एक्सप्रेस से मुम्बई के लिए रवाना हुए । पूरा दिन हमारा ट्रेन में ही कटा दिन का खाना भी हमने ट्रेन में ही खाया । दिनभर किस तरह काटा चाची से थोड़ी थोड़ी देर में बात कर रहे थे वे हमें बताती जा रही थी अब कौन सा स्टेशन आयेगा । थोड़ी देर ट्रेन में सोये फिर इगतपुरी में हम लोगों ने वड़ापाव खाया बहत मजा आया नौ बजे हम दादर पहुँचे हमें लेने के लिये श्वेता चाची आशिष चाचा और आकांक्षा आये । हम उनके साथ टेक्सी से प्रभादेवी गये रास्ते में वे हमें मुम्बई दिखा रही थी और भी बहुत कुछ देखा टेक्सी से । फिर हम उनके घर पहुँचे वे सिल्वर ड्यूंस आपर्टेमेंट में रहती है । घर पर सोनू चाचा और दादाजी से मिले श्वेता चाची ने अपना घर दिखाया वाकई उनका घर बहुत प्यारा है । फिर हम सब लोगों ने मिलकर खाना खाया । उसके बाद सो गये क्योंकि बहुत थक गये थे सुबह उठे तब जाकर सफर की थकान दूर हुई । 24 दिसंबर को हम लोग मुम्बई के मशहूर मंदिर सिध्दीविनायक मंदिर गये । फिर वहाँ से हम शिवाजी पार्क गये वहाँ पर बहुत ही प्यारा दरिया देखा बहुत अच्छा लगा से हम लोग अपने घर के पास वाले दरिया पर गये वहाँ सब लोगों ने सेवपूरी भेलपूरी , पानीपूरी खाई । बहुत देर तक दरिया पर घूमते रहे । घर आकर खाना खाया सबके साथ देर रात तक बातें करते रहे । 25 दिसंबर को हम अपने रिश्तेदारों के यहाँ गये पहली बार मुम्बई की लोकल ट्रेन में सफर किया मजा आ गया । 26 दिसंबर को हम हाजी अली की दरगाह पर गये वहाँ हमने बहुत सारी फोटोग्राफस खीचंवाई उसके बाद दरगाह के पीछे दरिया पर गये । फिर वहाँ से हम लोग महालक्ष्मी मंदिर गये वहाँ प्रार्थना की । 27 को हम अपने रिश्तेदारों के घर गये आशिष चाचा ने वड़ा पाव बनाया । 28 को हम गेट वे आँफ इंडिया गये बहुत देर तक घूमें वहाँ से हम मरिन ड्राइव गये वहाँ हमने अपनी चाची के साथ बहुत सारी बातें की मस्ती की नरिमन पाइंट गये हैगिंग गार्डन गये । 29 को हम लोगों ने घर पर फिल्म देखी । रात को हम सी कोर्नर होटल गये खाना खाने वहाँ पर दरिया पर गये । 30 को हम मुम्बई के बहुत ही मशहूर बीच जुहू बीच पर गये वहाँ हम सब लोगों ने फोटो खिचंवाई सेवपूरी , भेलपूरी , खाई नारियल पानी पिया । हम लोगो ने पानी पर बहुत मजा किया । हमने वहाँ अपने कुछ खास दोस्तों के लिये प्यारे प्यारे तोहफे खरीदे । 31 साल का आखरी दिन हम जतरा मेला गये ये मेला अक्सर मकर संक्रति के पहले लगता है । वहाँ घूमे मस्ती की वहाँ से प्रभादेवी के मंदिर गये । घर पर हमारी मम्मी ने पुलाव बनाया घर पर ही हम लोगों ने मिलकर ढ़ेर सारी मस्ती की एक तो साल का आखरी दिन और हमारे आशिष चाचु का जन्मदिन उन्होने केक काटा फिर हम लोगों ने बहुत सारी मस्ती की 2 बजे रात तक हम लोगों ने मस्ती की । 1 जनवरी को भी हम लोगों ने ढ़ेर सारी खरीददारी और भी मस्ती की रात को चाचा ने केक काटा चाची ने चाइनिज बनाया रात भर हम लोग हँसते हँसाते रहे पापा की कविताँए सुनते रहे मस्ती करते रहे ना खुद सो रहे थे ना दूसरो को सोने दे रहे थे । 2 जनवरी को हम लोगों के जाने का दिन आ गया दिनभर हम अकु से साथ खेलते रहे कैसे दिन बीत गये पता ही नही चला रात को नौ बजे हमारे जाने का समय हो गया फिर हम टेक्सी से दादर स्टेशन आये ट्रेन से वापस दुर्ग आ गये 3 को हम दोपहर 4 बजे दुर्ग आ गये । इतनी प्यारी इतनी छुटिटयाँ आज तक इतनी खूबसूरत जगह पर नहीं बीती । बहुत खूबसूरत जगह है मुम्बई इतनी खूबसूरत की हर बार जाने का मन होता है । इंसान को एक बार कोई जगह अच्छी लगने लगे तो वो बार बार वहाँ जाना पसंद करेगा । हमें मुम्बई बहुत अच्छा लगा हम हर बार वही जाना पसंद करेगे ।

प्यार का एहसास

प्यार जिदंगी का बहुत खूबसूरत खुशनुमा एहसास है । प्यार की अनुभूति तो उसे ही हो सकती है जिसने कभी खुद प्यार जैसे खूबसूरत एहसास को महसूस किया हो या जिसने कभी प्यार किया हो । जो प्यार को महसूस करें या प्यार करें वे ही प्यार को लफ्जों में बाँध सकता है लफ्ज तो तब ही निकलेगें जब आप उसें महसूस करें । प्यार का हर रंग अलग है । प्यार हर रिश्ते से अलग अलग रुप में किया जाता है जैसे माँ अपने बेटे से ,पिता अपनी बेटी से ,भाई अपनी बहन से , बहन अपने भाई से बहन बहन से ,भाई भाई से करता है पति अपनी पत्नी से , पत्नी अपने पति से ,प्रेमी अपनी प्रेमिका से , प्रेमिका अपने प्रेमी से और हम खुद अपनेआप से प्यार करते है । प्यार का रिश्ता अपने आप में खूबसूरत है । प्यार हर रिश्ते को मजबूती देता है । इंसान के लिए प्यार करना बहुत ज़रुरी है क्योंकि वो तब ही इस रिश्ते की नजाकत को पहचानेगा । प्यार जैसे खूबसूरत एहसास को दुनिया की नजरें गल्त नजरों से देखती है जबकि पूरी दुनिया तो प्यार की नींव पर ही टिकी हुई है । हम अगर एक दूसरे से प्यार ना करे तो एक दूसरे को समझे और जाने कैसे । जब एक बच्चे को प्यार की ज़रुरत महसूस होती है तो वो अपनी माँ के पास जाता है । हर रिश्ते में प्यार एक अलग रुप में मिलता है । मैं ये नहीं कहती कि प्यार मत करो क्योकि प्यार तो हमारी जिदंगी का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है । मेरी नजर में प्यार करना कोई गल्त बात नहीं है प्यार कीजिए बशर्ते सही इंसान से । प्यार में जिदंगी खूबसूरत लगने लगती है ‘’ कहते है जब कोई प्यार करता है तो उसे दुनिया और दुनिया की हर की चीज खूबसूरत लगने लगती है और इंसान खुद खूबसूरत हो जाता है । ‘’ प्यार में बहुत सारे बदलाव आते है इंसान खुद इन बद्लावों को महसूस करता है । जो काम उसने कभी ना किये हो वो करने लगता है किसी काम में मन ना लगें किसी से ज्यादा बात करने का मन ना करें या ज्यादा करें । प्यार में इंसान के चेहरे पर एक अलग सी चमक और मुस्कान आ जाती है जो शायद पहले नहीं आई होगी । इस वक्त शायद इंसान को ज्यादा अकेलापन महसूस होगा । उसे एक दोस्त की ज़रुरत होगी जो उसकी बातों को समझे उससे बातें करे उसकी उलझनें सुलझाये । प्यार जैसे प्यारे प्यारे लम्हें हमारी जिदंगी के दरवाजे पर बार बार दस्तक नहीं देते है तो मैं अपने दिल से कहती हूँ कि इस लम्हे को खूबसूरती से जी लीजिये और इस रिश्ते को अपनी जिदंगी में इस कदर उतार लीजिये कि जिदंगी सारा खालीपन ही दूर हो जाये । क्योंकि ऐसे खूबसूरत और प्यारे लम्हे जिदंगी में बार बार नहीं आते है । हर चीज के आने और जाने का समय हमेशा एक जैसा नहीं होता है कोई चीज हमारी जिदंगी में कब चुपके से शामिल हो जाये और कब चली जाये इसका हम अंदाजा नही लगा सकते इसलिए उस समय से इतनी उम्मीदें ना रखे कि उससे आपकी उम्मीदें ही टूट जायें । आप ऐसे इंसान से प्यार करे जो आपके साथ हो आपके पास हो पर कभी कभी ऐसे नहीं होता है । अपनी आँखे बंदकर कर लें और उसे अपने दिल से याद कर महसूस करें तो उस व्यक्ति का आपको अपने आसपास होने का एहसास होगा । आपके दिल में ये एहसास कब जाग जायेंगा आपको खुद मालूम नहीं होगा । तो प्यार के प्यारे एहसास को महसूस कीजिये और दिल से अपनी जिदंगी को जी लीजिये । बुरी चीजों को दिमाग से बाहर के द्वार दिखायें और इस एहसास अपने दिल और दिमाग की राह दिखायें । मेरी जीने का तो यही फंडा है कि खुश रहों ,सदा मुस्कुराते रहो और अपने धैर्य को कभी मत खोने दो । मेरे लिए प्यार सब कुछ है मेरे लिए प्यार जैसे प्यारे शब्द में मेरी पूरी दुनिया सिमटी हुई है ।

आपकी कोपल

मेरे मोहल्ले में रमज़ान

इनायत विला में ‘’रमजान’’ के दिनों में इफ्तारी के समय मैं हर शाम इफ्तारी के लिये नबाब अंकल के यहाँ जाया करती थी । भले ही मैं रोजे नहीं रखती थी पर मैं वहाँ इफ्तारी के लिए ज़रुर जाती थी । मैं वहाँ खूब सजधजकर जाती थी ,मेरी मम्मी मुझसे पूछती थी कि कहाँ जा रही हो तो मैं कहती थी कि वहीं जहाँ रोज जाती हूँ । फिर मै वहाँ पहुँच जाती थी वहाँ पर जैसे सबके लिये वहाँ बैठने की इंतजाम होता था वैसे मेरे लिये भी विशेष तौर पर होता था । मेरी जगह हमेशा नबा अंकल के पास ही होती थी क्योंकि वे मुझे बहुत चाहते है ।जि दिनों रोजे होते थे उस दिन मेरी तीनो भाभियाँ आंसमा भाभी,नाजनी भाभी,बुशरा भाभी मेरी आंटी और नानी सुबह चार बजे से उठकर सहरी के लिए पकवान बनाने की तैयारी में लग जाती थी पकवान बनने के बाद सब नमाज पढ़ते उसके बाद सब खा पीकर या तो उसी समय सो जाते थे उसी समय अपने काम करने लगते थे मेरे तीनो भाई तो तुरंत सो जाते थे । आंटी व नानी व भाभियाँ तो अपने काम में लग जाते थे और सबके सो जाने के बाद नबाब अंकल अपने काम में लग जाते ,वे कुछ पढ़ते या अपने पेड़ों में पानी डालते या कुछ और करते पर उनका यह नियम आज भी कायम है कि वे अब भी सुबह चार बजे उठते है उन्हे सुबह आठ बजे आँफिस जाना होता था उन्हें पूरा दिन काम करना होता है इसलिए वे ज़्यादा रोजे नहीं रखते थे वे कुछ खास रोजे ही रखते थे । सुबह आठ बजे से आंटी उनकी आँफिस जाने की तैयारी में लग जाती क्योंकि अंकल रोजे नहीं रखते थे इसलिए घर में उनके लिए खाने व उनके टिफिन में ले जाने के लिए खाना बनता था । साढ़े आठ बजे अंकल की आँफिस की गाड़ी अंकल को लेने आ जाती थी और अंकल अपने आँफिस के लिए निकल जाते थे । फिर शाम को कभी कभी वे जल्दी आ जाते थे कभी उन्हे देरी हो जाती थी पर वे ये कोशिश करते थे इफ्तारी की आज़ान होने से पहले घर पहँच जाऊँ । अंकल के जाने के बाद सब मिलजुलकर घर की साफ सफाई करते अपने अन्य काम करते काम समाप्त होने के बाद दिन में कुछ देर भाभियाँ आंटी व नानी थोड़ी देर के लिए टीवी देखते फिर कुछ देर के लिए सो जाते । मेरे भैया लोगों की हालत शाम तक जबाब दे देती थी वे पानी पानी गुहार लगातें रहते थे पर नियम तो नियम है भई नियम तो सबके लिए एक समान है । फिर शाम को चार बजे से मेरी तीनो भाभियाँ आंसमा भाभी, नाजनीन भाभी बुशरा भाभी मेरी आंटी और नानी मिलकर इफ्तारी के लिए ढेर सारे पकवान बनाने की तैयारी में लग जाते थे । उसके बाद सबके घर नाश्ता भेजने का क्रम चलता था । वहाँ की एक चीज मुझे बहुत पसन्द है, मीठा ब्रेड जिसे ‘’शाही टुकडा‘’ कहते हैं उसका रंग नारंगी होता है उसमें रंग के लिए जलेबी रंग ड़ाला जाता हैं यह बहुत ही मीठा होता है । इसे मीठा बनाने के लिए उसमें शक्कर बहुत भारी मात्रा में मिलायी जाती है यह मुझे बहुत अच्छा लगता है । और भी कई चीजें बनती थी जैसे कीमे का समोसा यह समोसा कीमे को मिलाकर बनाया जाता है यह नमकीन होता है पर बहुत की लज़ीज होता है ,पोहा, इडली साभंर, कस्टर्ड,गुलगुला जो कददू और आटे,ग़ुड़ या शक्कर को मिलाकर बनता है ,चावल के आटे का चिला अगर कभी कुछ ना बन पाता तो कभी कोई फल खाया जाता या खजूर तो रहता ही था । मै रोज अपनी सहेली डौली के साथ बातें करने जाती उसके घर जाती थी । तो रोज मैं नबाब अंकल के घर जा नहीं पाती थी पर नबाब अंकल मेरे लिए इफ्तारी का नाश्ता ज़रुर अलग से रखते थे क्योंकि उन्हे पता है कि मैं ज़रुर आऊंगी खाने के लिए ना सही पर उनसे मिलने के लिए ज़रुर आऊंगी व सबसे कह देते थे कि भई उसके हिस्से का नाश्ता अलग रखो वो आयेगी तो ज़रुर खायेगी । वो एक ऐसा घर है जिसमें आज भी मैं बेहिचक कुछ भी मांगकर खा सकती हूँ ।

आप सभी को रमज़ान मुबारक -कोपल