बालक होता हैं एक पौधा अध्यापक होता है एक माली




         फ्रोबेल का परिचय देते हुए श्री रस्क ने कहा की वे बाल्यावस्था के एक उत्साही , प्रेमी शिक्षा में खेल के प्रचारक तथा बालकों की संस्था किंडरगार्टन के संस्थापक थे ।

        वास्तव में पेस्तालोजी ने शिक्षा की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया था उसे फ्रोबेल ने आगे बढ़ाया और शिक्षा प्रेम की आग उन्होंने इतना फैलाया की आधुनिक युग में सर्वत्र ' किंडरगार्टन स्कूल' तथा 'शिशु शालाएं 'स्थापित किये गए औऱ स्थापित किये जा रहे हैं ।

        फ्रोबेल का जन्म 21 अप्रैल 1783 में जर्मनी के ओबर दी के जबाक नामक एक छोटे से ग्राम में हुआ था ।
       बचपन में ही माँ की मृत्यु हो गई उनके पिता पादरी थे दूसरी माँ फ्रोबेल के लिए सहानुभूति नहीं रखती थी अपने इस असहाय औऱ उपेक्षा पूर्ण जीवन के कारण अपने गांव के पास जंगलों में घूमते रहते थे औऱ प्रकृति से प्रेम करके अपने दुखी मन को प्रसन्न करते थे बाद में उनके यही दुखद अनुभव एवं प्रकृति के लिए प्रेम उनके शिक्षा - दर्शन के आधारभूत सिध्दांत बने । अपनी इस असहाय व दीनावस्था में उन्होंने अपनी शिक्षा गांव के एक छोटे से विधालय से प्रारंभ की जहां की शिक्षा व्यवस्था अच्छी नहीं थी ।
       फ्रोबेल का 15 बर्ष की आयु में पढ़ने में मन नहीं लगता था उन्हें बम रक्षक का काम सीखने के लिए भेजा यहां उनका प्रकृति से गहरा संबंध स्थापित करने का सुअवसर मिला । वह सम्भवतः प्रकृति विज्ञान की ओर आकृष्ट हुए औऱ उन्हें आध्यात्मिक एकता का अनुभव हुआ । आगे चलकर 1799 ई. जेना में विश्विद्यालय में प्रकृति विज्ञान का अध्ययन प्रारंभ कर दिया । अध्ययन काल में फ्रोबेल ने धनाभाव के कारण ऋण लिया था जिसे ना चुकाने के कारण उन्हें नौ सप्ताह जेल की सजा भुगतनी पड़ी ।


फ्रोबेल का व्यवाहारिक जीवन एवं शैशिक गतिविधियां

  • फ्रोबेल को जेल से मुक्त होने के बाद जीविकोपार्जन के लिए विवश होना पड़ा ।
  • फ्रैंकफर्ट में शिल्प सीखना शुरू किया जिसे वह पूरा नहीं कर सके ।
  • 23 वर्ष की अवस्था तक उन्हें वन रक्षक, अककॉउंटेंट , मानचित्र मापक, अध्यापक कई रूपों में कार्य करना पड़ा ।
  • अंत में उन्होंने अध्यापन को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया 1813 में शिसार्थी पेस्तालोजी से प्रशिक्षण प्राप्त करने बर्डन गए ।
  • 1813 में सैनिक बन गए
  • 1816 में कीलहाउ में यूनिवर्सल जर्मन एजूकेशन इंस्टीट्यूट नामक सँस्था के आधार पर झोपड़ी के रूप में शुरू की
  • 1837 में पुनः नवीन शिक्षा संस्था स्थापित करने की प्रेरणा हुई और बलेकेबर्ग के एक विधालय खोला जिसका नाम किंटरगार्टन रखा । इस विद्यालय की विशेषता खेल, गीत ,व्यापार के माध्यम से स्वतंत्र अभिव्यक्ति करानी थी इन विशेषताओ के कारण विद्यालय औऱ शिक्षण पध्दति की ख्याति दूर दूर तक हो गई । फ्रोबेल के बढ़ते प्रभाव को देखकर सरकार ने 1851 में उन्हें क्रांतिकारी बताकर विद्यालय को बंद कर दिया । अपने प्रिय विद्यालय बंद होने के आघात के कारण फ्रोबेल सहन न कर सके एक वर्ष बाद  21 जून 1852 में उनकी मृत्यु हो गई ।


फ्रोबेल की रचनाएं  -
  • एजूकेशन ओफ मैन
  • पैडागाजिक्स ऑफ़ दी किंटरगार्टन
  • एजूकेशन बाई डेवलपमेंट
  • मदर प्ले एंड नर्सरी सांग्स
  • आटोबायोग्राफी 


फ्रोबेल के अनुसार शिक्षा


फ्रोबेल शिक्षा को विकास की प्रक्रिया मानते हैं इसमें बालक की अन्तः शक्तियों की बाह्य अभिव्यक्ति होती है । 
"फ्रोबेल ने इस विकास की उपमा बीज व पेड़ से दी है विधालय की तुलना बाल-उधान से की है जहां बालक की बीज से की है । जिस प्रकार पेड़ औऱ पौधे से पेड़ के विकास की प्रक्रिया एक स्तर से दूसरे स्तर तक स्वाभाविक रूप से चलती रहती है उसी प्रकार बालक की विभिन्न अवस्थाओं से होकर शिक्षा की यह प्रक्रिया चलती रहती है ।
फ्रोबेल के अनुसार शिक्षा ऐसी प्रक्रिया है जिसमे सम्पूर्ण जीवन में भाग लेकर स्म्प्पर्ण जीवन को समझने और उसे सुखी व् समृध्ध बनाने का प्रयत्न किया जाता है


फ्रोबेल की किंटरगार्टन पध्दति

 1 मई १८४० को पर्वतो में घुमते हुए उन्हें किंटरगार्टन शब्द सूझा और अपने विद्यालय का नाम किंटरगार्टन ही चयन कर लिया जिसमे उन्होंने एक ऐसे उद्यान की कल्पना की जहाँ बालक एक पौधे के जैसे विकास करे जिसकी देखरेख कुशल माली (अध्यापक) करे




किंटरगार्टन पध्दति के सिद्धांत

  • स्व- क्रिया का सिद्धांत 
  • खेल द्वारा शिक्षा का सिद्धांत 
  • समाजिकता का सिद्धांत 
  • एकता का सिद्धांत 
  • आत्माभिव्यक्ति का सिद्धांत
  • विकास का सिद्धांत



किंटरगार्टन पध्दति की शिक्षा सामग्री

  • मदर प्ले एव शिशु गीत - मदर प्ले एव शिशु गीत लिखित रूप में पुस्तक में लिखे रहते है खेल गीत एव चित्र व् टिप्पणियाँ भी साथ रहते है बालको की ज़रूरत व् अवस्था  के अनुसार सिखलाया जाता है  आंगिक एव ज्ञानेन्द्रियो का और अनुभाव ज्ञान  में वृध्दि का विकास होता है ।
  • उपहार - ये उपहार लकड़ी , लोहे या अन्य किसी चीज के बने होते है इनके प्रयोग से बालक की आत्म क्रियाशीलता बढ़ती है अध्यापक इन्हें बालक को भेंट करता है इनके द्वारा बालक खेलता व् रचनात्मक कार्य करता है ये गोलाकार, बेलनाकार , आयताकार , घनाकार तथा वर्गाकार होते है ।
  • व्यापार् या कार्य - ये कार्य कागज काटना , लकड़ी की वस्तुएँ बनाना , चित्र बनाना , माला गूथना , सीना पिरोना , टोकरी बनाना ,,चटाई बुनना खिलौने बनाना ।
  • कहानियाँ - इस पध्धति में कहानियों की व्यवस्था की जाती है जिससे बालक की कल्पना शक्ति का विकास होता है वे विचारशील बनते है शब्द भण्डार भाषा के विकास होता है ।
  • बागबानी - बच्चो के बगीचे के रूप में सार्थक एव साकार बनाने हेतु प्रक्रति अध्ययन पर जोर दिया ।

      वह शिक्षा को जीवन से अलग नहीं करना चाहते है बल्कि शिक्षा एव जीवन में संलग्नता पर बल देते है उनके अनुसार बालक अपने चारो ओर के जीवन में पूरी तरह भाग लेकर ही अपनी शिक्षा पूरी करता है शिक्षा की इस प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति प्रक्रति को पहचानता है अपने आप को पहचानता है समाज के अन्य मनुष्यों को पहचानता है
      शिक्षा ऐसी प्रक्रिया है जिसमे सम्पूर्ण जीवन में भाग लेकर स्म्प्पर्ण जीवन को समझने और उसे सुखी तथा समृध्ध बनाने का प्रयत्न किया जाता है

5 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-09-2017) को "कैसा हुआ समाज" (चर्चा अंक 2722) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

शरद कोकास ने कहा…

अच्छी पोस्ट है ।

articles ने कहा…

बहुत उम्दा।

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

ज्ञानवर्द्धक पोस्ट

Unknown ने कहा…

Nice

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