आइये फिर याद करे और डूबे जीवन के इन रसों में

  

            हम जब कोई कहानी , कविता ,उपन्यास नाटक आदि पढ़ते देखते सुनते है तो हमे विलक्षण आनन्द मिलता है वही रस है Ι  रस वह गुणवत्ता है जो कलाकार और दसकार के बीच समझ उत्पन्न करती है। सबदिका स्तर पर रस का मतलब वह है जो चखा जा सके या जिसका आनद लिया जा सके जिस प्रकार लोग स्वादिष्ट खाना, जो कि मसाले, चावल और अन्य चीज़ो का बना हो, जिस रस का अनुभव करते है और खुश होते है उसी प्रकार स्थायी भाव और अन्य भावों का अनुभव करके वे लोग हर्ष और संतोष से भर जाते है । संस्कृत में कहा गया है कि "रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्" अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य है। काव्य में जो आनन्द आता है वह ही काव्य का रस है। काव्य में आने वाला आनन्द अर्थात् रस लौकिक न होकर अलौकिक होता है। रस काव्य की आत्मा है।


            किसी काव्य के पठन श्रवण का अभिनय दर्शन
            पाठक श्रोता अभिनय दर्शक का जब हर लेता मन
            और अलौकिक आनन्द से जब मन तन्मय हो जाता
            मन का यह रूप काव्य में रस कहलाता Ι

काव्यस्वादन के अनिवर्चनीय आनन्द ही रस है Ι

विभाव ,अनुभाव , स्थायी और संचारी भावों से संयोग से रस की निष्पत्ति होती है Ι

रस है तरह - तरह के

शृंगार रस को रसराज कहा गया है। नाटक में 8 ही रस माने जाते हैं क्योंकि वहाँ शांत को रस नहीं गिना जाता। भरत मुनि ने रसों की संख्या 8 मानी है। हिंदी में केशवदास(16वीं शती ई.) शृंगार को रसनायक और देव कवि (18वीं शती ई.) सब रसों का मूल मानते हैं। "रसराज" संज्ञा का शृंगार के लिए प्रयोग मतिराम (18वीं शती ई.) द्वारा ही किया गया मिलता है। दूसरी ओर बनारसीदास(17वीं शती ई.) "समयसार" नाटक में "नवमों सांत रसनि को नायक" की घोषणा करते हैं। रसराजता की स्वीकृति व्यापकता, उत्कट आस्वाद्यता, अन्य रसों को अंतर्भूत करने की क्षमता सभी संचारियों तथा सात्विकों को अंत:सात् करने की शक्ति सर्वप्राणिसुलभत्व तथा शीघ्रग्राह्यता आदि पर निर्भर है। ये सभी बातें जितनी अधिक और प्रबल शृंगार में पाई जाती हैं, उतनी अन्य रसों में नहीं। अत: रसराज वही कहलाता है
1 श्रृंगार रस - जहाँ स्त्री - पुरुष के प्रेम भाव का वर्णन होता है वहां श्रृंगार रस होता है इसका स्थायी भाव रति है Ι इस अवधि द्वारा एक बहुत गहरी समझ अवगत को कराया जाता है, श्रृंगार अवधि का मतलब है सौंदर्य।

बतरस लालच लाल की, मुरली धरि लुकाय। 
सौंह करे, भौंहनि हँसै, दैन कहै, नटि जाय। (बिहारी)
संयोग  श्रृंगार रस 
संयोग शृंगार
जहाँ स्त्री - पुरुष के के मिलन का वर्णन होता है संयोग श्रृंगार है Ι
सुखद मौसम, माला, गहने, लोग, अच्छे घर, सुखों का आनंद, उद्यान के यातरें, सौंदर्य की बातें सुनने और देखने और आदि विभावों से सम्भोग श्रृंगार उत्पन्न होता है।

उदाहरण - दूल्ह श्री रघुनाथ बने दुलही सिय सुंदर मन्दिर माही Ι
गावति गीत सवै मिलि सुन्दरी , वेड जुआ जूरी विप्र पढ़ाही ΙΙ
राम निहारती जानकी , कंकन के नग की परछाहीं Ι

यातें सब सुधि भूल गई , कर टेकी रही , पल टारति नाहीं ΙΙ

वियोग श्रृंगार रस 
v

जहाँ स्त्री - पुरुष के बीच वियाग का वर्णन होता है वियोग श्रृंगार रस होता है Ι
दो तरह के होते है: अभाव से उत्पन्न होने वाली जुदाई और असंतोष से उत्पन्न होने वाली जुदाई। अभाव से उत्पन्न होने वाली जुदाई को प्रवास कहा जाता है, यह प्रोषित्प्रिय नामक अभिनेत्रि मे देखा गया है। असंतोष से उत्पन्न होने वाली जुदाई, दो प्रेमी जो कि एक दूसरे को देखना नही चाहते या एक दूसरे को आलंगन नही करना चाहते, के बीच पैदा होता है। 

   उदाहरण     - मधुबन तुम कत रहत हरे Ι

         विरह - वियोग श्याम सुंदर के , ठाढ़े क्यों न जरे ? 

2 हास्य रस -
हास्य रस 

जब किसी विचित्र वेशभूषा , हावभाव को देखकर हंसी आती हो , वहां हास्य रस होता है


उदाहरण -
 तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप, साज मिले पंद्रह मिनट घंटा भर आलाप।
घंटा भर आलाप, राग में मारा गोता, धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता। (काका हाथरसी)


3 रौद्र रस -
रौद्र रस 

यह आमतौर पर राक्षसों दानवो और बुरे आदमियों में होता है |इसका स्थायी भाव क्रोध है विरोधियों द्वारा जब कोई अनुचित कार्य होता है तब आश्रय के मन में रौद्र रस की उत्पत्ति होती है Ι


उदाहरण - कहा कैकयी ने सक्रोध दूर हो दूर अरे निर्बोध Ι

         सामने से हट अनधिक न बोल दि  जिहै ! रस में विष मत घोल ΙΙ






4 भयानक रस -
भयानक रस 
भयानक का स्थायी भाव भय है इसका उत्पादन, क्रूर जानवर के भयानक आवाज़ो से, प्रेतवाधित घरों के दृषय से या अपनों कि मृत्यु कि खबर सुनने आदि अन्य निर्धारक तत्वों द्वारा होता है। हाथ, पैर, आखों के कंपन द्वारा इसका प्रतिनिधित्व किया जा सकता है । 
उदाहरण - उधर गरजती सिन्धु लहरियां , कुटिल काला के जालों सी Ι
         चली आ रही , फेन उगलती , फन फैलाए व्यालों सी ΙΙ (जयशंकर प्रसाद




5 वीर रस -
वीर रस 

इसका स्थायी भाव उत्साह है वीर का भाव बेहतर स्वभाव के लोग और उर्जावन उत्साह से विषेशता प्राप्त करती है। इसका उत्पादन असम्मोह, अध्यवसय, नाय, पराक्रम, श्क्ती, प्रताप और प्रभाव आदि अन्य निर्धारक तत्वों द्वारा होति है ।

उदाहरण - बुंदेले हर बोलो के मुँह से हमने सूनी कहानी थी Ι

         खूब लदी मर्दानी , वः तो झांसी वाली रानी थी ΙΙ






6 अद्भुत रस -

इसका स्थायी भाव आश्चर्य या विस्मय है किसी आश्चर्यजनक वस्तु या घटना को देखकर व्यक्ति के मन में विस्मय जागृत हो वहां अद्भुत रस होता है Ι

उदाहरण - बिनु पग चले सुने बिनु काना Ι कर बिनु कर्म करे विधि नाना Ι

        आनन रहित सकल रस भोगी Ι बिन वाणी वक्ता बड़ जोगी ΙΙ

            अखिल भुवन चर- अचर सब, हरि मुख में लखि मातु। 
         चकित भई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु॥(सेनापति)

7 करुणा रस -
करुणा रस 

करुणा का भाव शोक  है। इसका उत्पादन अपनो और रिशतेदारों से जुदाई, धन की हानी, प्राण की हानी, कारावास, उडान, बदकिसमती, आदि अन्य निर्धारक तत्वों द्वारा होति है।




                                                           

                                           उदाहरण - अभी तो मुकुट बाँधा था माथ , हुए कल ही हल्दी के साथ Ι
                                              हाय रुक गया यही संसार , बना सिन्दूर अंगार ΙΙ

                                            सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सीलु बलु तेजु बखानी॥ 
                                          करहिं विलाप अनेक प्रकारा। परिहिं भूमि तल बारहिं बारा॥(तुलसीदास)

8 वीभत्स रस -
वीभत्स रस 

बीभत्स का भाव जुगुप्सा नामक स्थायी मणोदषा से उतपन्न होता है। इसका उत्पादन, अप्रिय, दूषित, प्रतिकूल, आदि अन्य निर्धारक तत्वों द्वारा होता है।


उदाहरण -
  
            सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत।
            खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनंद उर धारत॥
              गीध जांघि को खोदि-खोदि कै माँस उपारत।
              स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत॥(भारतेन्दु)

9 शांत रस -
शांत रस 
शांत का भाव शांति है और यह भाव हर उस चीज़ से हमे मुक्ति दिलाता है जो हमारि मणोदषा को परेशान करती है।




उदाहरण - सुन मत मूढ़ ! सिखावन मेरो Ι
           हरि - पद विमुख लह्ह्रो न काहू सुख सठ यह समुझ सबेरो Ι

         मन रे तन कागद का पुतला। 
         लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना॥ (कबीर)


1 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (10-10-2017) को
"थूकना अच्छा नहीं" चर्चामंच 2753
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

एक टिप्पणी भेजें