नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है। सूर्य चन्द्र युग-मुकुट मेखला रत्नाकर है।


काव्य के छन्द 

  
"छन्द काव्य को स्मरण योग्य बना देता है।"
छंद का सर्वप्रथम उल्लेख 'ऋग्वेदमें मिलता है। जिसका अर्थ है 'आह्लादित करना', 'खुश करना' 
   अर्थात्- छंद की परिभाषा होगी 'वर्णों या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास से यदि आह्लाद पैदा होतो उसे छंद कहते हैं' 
छंद के अंग जैसे हमारे शरीर बहुत सारे अंग होते है उसी तरह छंद के भी अंग होते है जिनसे एक छंद बनता है
1 चरण या पाद (क) समचरण  (ख) विषम चरण
2 वर्ण और मात्रा
3 यति
4 गति
5 तुक
6 गण
1. चरण या पाद:- चरण को पाद भी कहते हैं। एक छंद में प्राय: चार चरण होते हैं। चरण छंद में प्राय चार चरण होते है  प्रत्येक पाद में वर्णों या मात्राओं की संख्या निश्चित होती है। चरण दो प्रकार के होते हैं:-

क)- समचरण:- दुसरे और चौथे चरण को समचरण कहते हैं।
ख)- विषमचरण:- पहले और तीसरे चरण को विषमचरण कहते हैं।
2. वर्ण और मात्रा - छंद के चरणों को वर्णों या मात्राओं की गणनानुसार व्यवस्थित किया जाता है। वर्णों के उच्चारण में जो समय लगता है उसे मात्रा कहते है छंद में प्रयुक्त अक्षर को वर्ण कहते हैं। मात्रा की दृष्टी से वर्ण दो प्रकार के होते है:-
क)- लघु या ह्रस्व
ख)- गुरु या दीर्घ
3. यति - इसे विराम और विश्राम भी कहते हैं। छंद का पाठ करते समय कुछ देर के लिए जहाँ हम रुकते है उसे ही यति कहते हैं। इसके लिए कुछ चिन्ह निश्चित होते हैं।
जैसे:- ( , ), ( l ), ( l l ), ( ? ), ( ! ) आदि।
उदा - मेरे प्यारे कुंवर अब भी क्यों नहीं आए
4. गति:- किसी छंद को पढ़ते समय हम एक प्रवाह का अनुभव करते हैं, उसे गति या लय कहते हैंहर छंद की एक अलग लय होती है जिस लय या प्रवाह में दोहा पढ़ा जाता है उसी प्रवाह में चौपाई नहीं पढ़ी जा सकती है छंद में पदांत के अक्षरों की समानता को तुक कहते हैं।
5. तुक: तुक वर्णों की आवृति है चरण के अंत में वर्णों की आवृति को तुक कहते है भिन्न - भिन्न छन्दों में तुक का प्रयोग अलग - अलग रीति से किया जाता है
अतुकान्त - जब किसी भी चरण की तुक न मिले जैसे आज की नयी कविता

उदाहरण:-
" हमको बहुत है भाती हिंदी।
हमको बहुत है प्यारी हिंदी।"
चरण के अंत में वर्ण की आवृत्ति न हो उसे अतुकांत कविता कहते हैं। नई कविता प्रायः अतुकांत होती है।
उदाहरण:-
"काव्य सर्जक हूँ
प्रेरक तत्वों के अभाव में
लेखनी अटक गई हैं
काव्य-सृजन हेतु
तलाश रहा हूँ उपादान।"
5. गण:- वर्णिक छंदों की गणना 'गण' के क्रमानुसार की जाती है। तीन वर्णों का एक गन होता है। गणों की संख्या आठ होती है।
जैसे:-
यगण, तगण, लगण, रगण, जगण, भगण, नगण और सगण।
छंद चार प्रकार के होते हैं:-
1)- मात्रिक छंद
2)-वर्णिक छंद
3)-वर्णिक वृत्त
4)-मुक्त छंद
1)- मात्रिक छंद- जिन छंदों की रचना मात्राओं की गणना के आधार पर होती है, उन्हें मात्रिक छंद कहते हैं। जैसे- दोहा, चौपाई, रोला आदि।
मात्रिक छंद तीन प्रकार के होते हैं:-
a)- सममात्रिक छंद
b)- अर्धमात्रिक छंद
c)- विषम मात्रिक छंद
a)- सममात्रिक छंद -जहाँ छंदों में सभी चरण समान होते हैं, उसे सममात्रिक छंद कहते हैं। इसमें 11-11 मात्राएँ हैं।
उदाहरण:-
"मुझे नहीं ज्ञात कि मैं कहाँ हूँ
प्रभो! यहाँ हूँ अथवा वहाँ हूँ।"
b)- अर्धमात्रिक छंद -जिसमे पहला और तीसरा चरण एक समान हो तथा दूसरा और चौथा चरण उनसे भिन्न हों किन्तु आपस में समान हों, उसे अर्धमात्रिक छंद कहते हैं। जैसे-दोहा छंद ।
c)- विषम मात्रिक छंद:- जहाँ चरणों में दो चरण अधिक समान न हों , उसे विषम मात्रिक छंद कहते हैं। ऐसे छंद प्रचलन में कम हैं। जैसे- छप्पय छंद ।
2. वर्णिक छंद - इसमें वर्णों की गणना होती है इसमें चार सामान चरण होतेहैं और प्रत्येक चरण में आने वाले लघु गुरु का क्रम सुनिश्चित होता है जैसे मत्तगयंद सवैया, उपेंद्रवज्रा, इन्द्रवज्रा ।
3. वार्णिक छंद -जिन छंदों की रचना वर्णों की गणना के आधार पर होती है, उसे वार्णिक छंद कहते हैं। जैसे- दुर्मिल सवैया ।
4. मुक्त छंद -चरणों की अनियमित, असमान, स्वछंद गति और भाव के अनुकूल यति विधान ही मुक्त छंद की विशेषता है। यह एक लयात्मक गण है इससे पद्द का काम चलता ही निराला से नई कविता तक हिंदी में इसी का प्रयोग हुआ है। इसे रबर या केंचुआ छंद भी कहते हैं।
कुछ प्रमुख छन्दों के उदहारण:-
दोहा छंद 
यह अर्धसममात्रिक छंद है।यह सोरठा छंद के विपरीत होता है। इसमें प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में11-11 मात्राएँ होती है। चरण के अंत में लघु ( l ) होना आवश्यक है और तुक भी आवश्यक है ।
उदाहरण:-
Sll SS Sl S SS Sl lSl
"कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर।
S S I I I I S I
बरनों रघुवर विमल जस
सोरठा छंद  - यह अर्धसममात्रिक छंद है। यह दोहा छंद के विपरीत होता है। इसमें प्रथम और तृतीय चरण में 11-11 तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। इसके अंत में लघु आवश्यक होता है
उदाहरण:-
 I I S S I I SI
 कहिए काहि अछूत
जो सुमिरत सीधी होई , गण नायक करिबर बदन
I I I I I S I S I  I I S I  I I  I I  I I I
रोला छंद  - यह एक मात्रिक छंद है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 11 और 13 के क्रम से 24 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक चरण के अंत में दो गुरु या दो लघु वर्ण होते है ।
उदाहरण:-
SSll llSl lll ll ll Sll S
"नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है।
सूर्य चन्द्र युग-मुकुट मेखला रत्नाकर है।
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारे मंडन है।
बंदी जन खग-वृन्द, शेष फन सिंहासन है।"
 गीतिका छंद- यह एक मात्रिक छंद है। इसके चार चरण होते है। प्रत्येक चरण में 14 और 12 यति से 26 मात्राएँ होती है। अंत में क्रमश: लघु-गुरु होता है। इस छंद के तीसरी , दसवी , सत्रहवी और चौबीसवी मात्रा लघु होनी चाहिए और अंत में रगण ( S I S ) ऐसा होने पर छंद अत्यंत ही श्रवण सुखद हो जाता है
उदाहरण:-
S SS SlSS Sl llS SlS
"हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिये।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये।
लीजिए हमको शरण में, हम सदाचारी बने।
ब्रह्मचारी, धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें।"
हरगीतिका छंद - यह एक मात्रिक छंद है। इसमें चार चरण होते हैं। इस छंद के प्रत्येक चरण में16 और 12 के विराम से कुल 28 मात्राएँ होती हैं। अंत में लघु-गुरु का प्रयोग अधिक ही प्रचलित है।
उदाहरण:-
SS ll Sll S S S lll SlS llS
"मेरे इस जीवन की है तू, सरस साधना कविता।
मेरे तरु की तू कुसुमित , प्रिय कल्पना लतिका।
मधुमय मेरे जीवन की प्रिय,है तू कल कामिनी।
मेरे कुंज कुटीर द्वार की, कोमल चरण-गामिनी।"
उल्लाला छंद- यह एक मात्रिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में15 और 13 की यति से कुल 28 मात्राएँ होती हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में पन्द्रह - पन्द्रह और दुसरे और चुठे चरण में तेरह - तेरह मात्राएँ होती है
उदाहरण:-
llS llSl lSl S llSS ll Sl S
"करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेश की।
हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण-मूर्ति सर्वेश की।



3 टिप्पणियाँ:

Kavita Rawat ने कहा…

छंदों की सोदाहरण प्रस्तुति बहुत सुन्दर लगी, धन्यवाद

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (27-10-2017) को
"डूबते हुए रवि को नमन" (चर्चा अंक 2770)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कोपल कोकास ने कहा…

धन्यवाद कविता जी

एक टिप्पणी भेजें