छतीसगढ़ की प्राचीन मुद्रा

एक समय था जब भारत को अक्सर सोने की चिड़िया कहा जाता था। अनेक वर्षों के बाद, विविध संभताएं स्वर्ण पर एक मुद्रा के रुप में निर्भर थी और यह समृद्धि का प्रतीक भी रहा। यहां पर आप पढ़ेंगे, भारत के सोने के सिक्कों के बारे में कुछ अद्भुत तथ्य, जो यह सिद्ध करते हैं, कि स्वर्ण को लेकर हमारा प्रेम सचमुच समय से परे है।

आज से लगभग 2 ,600 वर्ष पूर्व से ही भारत में सिक्कों का चलन प्रारम्भ हो चुका था जो दो प्रकार के थे प्रथम शतमान और दितीय कार्षापण l

शतमान सिक्का 100 रत्ती वजन का होता था उसके आधे , चौथाई और आठवें भाग के सिक्के क्रमशः अर्धशतमान , पादशतमान , और पादार्धशतमान कहलाते थे

कार्षापण माला में भी अर्धकार्षापण , पादाकार्षापण आदि सिक्के चालू थे चतुमार्ष्क , त्रिमाश्क , द्विमाश्क , एकमाषक और अर्धमाषक सिक्कों का भी हमारे प्राचीन साहित्य में मिलता है l

आहत मुद्राएं -
आहत या पंचमार्क सिक्के भारतवर्ष के सबसे प्राचीन सिक्के है उन पर जो चिन्ह बनाये जाते थे वे पंच करके बनाये जाते थर सष्ट सिक्के गोल , चौकोर , एनी आकर के होते थे वे मोटे , पतले , आकार में बड़े और कुछ छोटे वजन में एक से होते थे आहत सिक्के चांदी और तांबे दोनों धातुओं के मिलते है महाकौशल से मिले आहत सिक्को पर मिलने वाले चिन्हों का एक नक्षा रायपुर में पुरातत्व दीर्घा में है l छतीसगढ़ में आहत मुद्राएं मल्हार ,आरंग ,रामगढ़ ,अकलतरा ,ठठारी ,तारपुर , राजपुर आदि स्थानों से प्राप्त हुई है जो चांदी और तांबे की है । इन सिक्कों में वेदिका वृक्ष , पर्वत , सरोवर और गज चिन्ह प्राप्त होते है ।

सातवाहन कालीन मुद्राएं - ये मुद्राएं छतीसगढ़ में बालपुर , रायगढ़ , मल्हार ,बिलासपुर जिले के चकरबेड़ा ग्राम से प्राप्त हुई है इन मुद्राओं के अग्रभाग में राजा का आवक्ष भाग द्रश्र्व्य है । दुर्ग जिले के कुलिया गाँव में रोमन स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त हुई है जिसके अग्रभाग में रोमन राजा के वंश का अंकन है एवं चारो ओर राजा का विरुद अस्पष्ट है । इसके अतिरिक्त शक क्षत्रपों के सिक्के भी रायगढ़ जिले से प्राप्त हुए है । टॉलेमी ने अपने भूगोल में चष्टन को पश्चिमी मालवा तथा उज्जैन का स्वामी कहा है। चष्टन की मुद्रायें गुजरात में काठियावाड़ से मिली हैं किन्तु चष्टन के पुत्र जयदामन की मुद्रायें पुष्कर से भी प्राप्त हुई हैं, यह प्रदेश पूर्व में सातवाहनों के अधिकार में था। अत: अनुमान किया जा सकता है कि पुलुमावी को पराजित करके ही शकों ने इस पर अधिकार जमाया होगा। चष्टन ने अपने कुछ सिक्कों पर सातवाहनों के मुद्रा चिह्न चैत्य को अंकित करवाया था।

कुषाण मुद्राएं -
छतीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों से कुषाण कालीन शासकों विमकेडफिसिस ,कनिष्क हुविस्क आदि की ताम्र मुद्राएं मिली ही ,जिनके अग्रभाग में राजा की आकृति और पृष्ठभाग में नन्दी के साथ शिव का अंकन है । इन मुद्राओं का काल प्रथम सदी ई . सम्भावित है । मथुरा में इस शासक के तांबे के कुछ सिक्के प्राप्त हुए है । सम्राट कनिष्क के सिक्कों पर,यूनानी भाषा और लिपि में मीरों (मिहिर) को उत्कीर्ण कराया था, जिससे संकेत मिलता है कि ईरान का सौर-पूजक सम्प्रदाय भारत में प्रवेश आया था। ईरान में मिथ्र या मिहिर पूजा भी अत्यन्त लोकप्रिय थी। भारतीय मुद्रा पर सूर्य का अंकन किसी शासक द्वारा प्रथम दृष्टया कनिष्क द्वारा हुआ था।[14] पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर) के पास शाह जी की ढेरी नामक स्थान है, जहां कनिष्क द्वारा निमित एक बौद्ध स्तूप के अवशेषों से एक सन्दूक मिला जिसे कनिष्कास कास्केट बताया गया है। इस पर सम्राट कनिष्क के साथ सूर्य एवं चन्द्र के चित्र का अंकन हुआ है। इस सन्दूक पर कनिष्क के द्वारा चलाये गए शक संवत्सर का संवत का प्रथम वर्ष अंकित है।
गुप्तकालीन मुद्राएं -
गुप्तकाल में भारतीय सिक्कों की एक नै क्रान्ति हुई इस राजवंश ने शुद्द्द भारतीय ढंग के सिक्के चलाये ये सिक्के सोने ,चांदी और तांबे तीनो धातुओं के मिलते है  दुर्ग जिले के बानवरद ग्राम से गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त हुई है जिनमें धनुर्धारी एवं अश्वारोही प्रकार के प्रमुख है l इन सिक्कों के अग्रभाग में धनुष लिए हुए राजा के अंकन के साथ - साथ राजा के नाम का उल्लेख है एवं पृष्ठभाग में देवी का अंकन है l ये सिक्के तीसरी - चौथी शती ई . के प्रतीत होते है l गुप्तकालीन सिक्के न केवल कलापूर्ण प्रतिमाओं के लिए प्रसिध्द है बल्कि उन पर संस्कृत छंद में लेख मिलते है छ्न्दोमय लेख गुप्तकालीन सिक्कों की अपनी विशेषता है l

शरभपुरीय मुद्राएं -
गुप्त राजाओं के समकालीन शरभपुरीय वंश और नलवंश के शासकों की स्वर्ण मुद्राएं भी केवल छतीसगढ़ में मिले है इन राजाओं में प्रस्न्न्मात्र , महेन्द्रादित्य , क्रमादित्य प्रमुख है l ये सिक्के ठप्पान्कित है सिक्कों के मात्र अग्रभाग में गरुड़ का अंकन है और उसके नीचे राजा का नाम उत्कीर्ण है l कुरुद में कुछ ताम्रपत्र मिले हैं जो राजा नरेन्द्र के काल के हैं। छत्तीसगढ़ में कुछ सोने के सिक्के भी मिले हैं। ये कई स्थानों में मिले हैं, जो प्रसन्नमात्र के समय के हैं। शरभपुरियो कि राजमुद्रा गजलक्ष्मी थी जो इनके ताम्र पत्रो और सिक्को में अंकित है।

चीन मुद्राएं - छतीसगढ़ की प्राचीन राजधानी मुख्यालय सिरपुर से 8 वी सदी ई . की चीन की ताम्र मुद्राएं प्राप्त हुई है l तांबे के चौकोर सिक्कों के बीच में वर्गाकार छिद्र है मुद्राओं के चारों ओर चीन की लिपि में राजा और उसके विरुद का उल्लेख है l

नलवंशी मुद्राएं - भूमि गर्भ से मिली सोने के मुद्रा आदि से चक्रकूट अर्थात बस्तर में नल राजवंश का प्रारंभिक  इतिहास सृजित हुआ छतीसगढ़ में गुप्त साम्राज्य के समकालीन , नलवंश के शासकों की स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त हुई है इनमे भवदत्त , अर्थपति , स्तम्भ और नंद्नराज प्रमुख है l ये सिक्के वजन में अत्यंत कम है l अग्रभाग में बैठे हुए नन्दी की आकूति है और नीचे राजा के नाम का उल्लेख है l

कलचरि मुद्राएं -
छतीसगढ़ मेंत्रिपुरी और रतनपुर कलचुरियों की स्वर्ण , रजत और ताम्र मुद्राएं प्राप्त हुई है l इनमें गांगेयदेव , पृथ्वीदेव , जाजल्यदेव , रत्नदेव प्रमुख है ये सिक्के के अग्रभाग में राजा के नाम है और पृष्ठभाग में देवी का चित्र है l कलचुरि वंश के राजा गांगेयदेव ने सोने के सिक्के का रूप स्थिर किया और अपने नाम से सोने के सिक्के चलाये जिन पर एक ओर तो उनका नाम होता और दूसरी ओर लक्ष्मी की प्रतिमा l

पदम टंका - छतीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों से पदम टंका भी मिले है जिनकी आकृति कटोरीनुमा और अनुभाग में शंख , पुष्प का अंकन है l इन सिक्कों को यादव राजवंश से सम्बद्द माना जाता है l

सल्तनत कालीन मुद्राएं -
विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त सल्तनत कालीन ताम्र और रजत मुद्राओं का रायपुर संग्राहालय में संग्रहित है जिसके अग्रभाग में बादशाह का नाम और पृष्ठभाग में कलमा लिखा हुआ है l

मुगलकालीन मुद्राएं -
राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से मुगलकालीन स्वर्ण, रजत , ताम्र से ढली मुद्राएं प्राप्त हुई है जिनमें अकबर , जहांगीर , शाहजहाँ , औरंगजेब , शाह आलम के सिक्के प्रमुख है l इन सिक्कों के अग्रभाग में बादशाह का नाम और पृष्ठ भाग में कुरान की आयतें लिखी हुई है l मुगलकालीन चांदी के इस सिक्के का वजन 11 ग्राम है मुगल काल में सोने के सिक्कों का काफी चलन हुआ और अकबर और जहांगीर जैसे लोकप्रिय बादशाहों में परम्परा तोडकर कुछ ऐसे सिक्के जारी किए जिन पर प्रतिमाएं या आकृतियाँ बनाई गई अकबर के एक सिक्के पर धनुष लिए राम और उनके साथ सीता की प्रतिमा मिलती है जहांगीर के सिक्कों पर बारह राशियों की आकृतियाँ है l

राजर्षितुल्य कुल - छत्तीसगढ़ के आरंभ में कुछ ताम्रपत्र मिले हैं जिसमे राजर्षितुल्य वंश के शासक भीमसेन (द्वितीय) का उल्लेख है। राजर्षितुल्य नाम के राजवंश का शासन दक्षिण-कौसल में पाँचवीं सदी के आस पास था। कुछ लोगों का यह कहना है कि ये राजा महेन्द्र के वंशज थे, पर इसका कोई प्रामाणिक आधार नहीं मिलता।
अन्य रियासतों के सिक्के - रायपुर संग्रहालय में विभिन्न स्टेटों द्वारा जारी की गई मुद्राएं भी संग्रह है l इसमें मैसूर और ग्वालियर स्टेट की मुद्राओं की प्रमुखता है l

ब्रिटिश कालीन मुद्राएं -
छतीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों से ब्रिटिश कालीन मुद्राएं और विक्टोरिया , एडवर्ड , विलियम राजाओं की प्राप्त हुई है इनके अग्रभाग में मूल्य और पृष्ठभाग में राजा और रानी की तस्वीर अंकित है l फारस की खाड़ी के त्रुशल स्टेट्स को भी 1946 तक सैद्धान्तिक रूप से ब्रितानी भारत की रियासत माना जाता था और वहाँ मुद्रा के रूप में रुपया काम में लिया जाता था।


सिक्कों ने भारत के स्वर्ण के साथ के संबंधों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज, भारत में स्वर्ण के सिक्के सुरक्षा, शुद्धता, मान सम्मान और मूल्य, सभी का एक संस्करण माने जाते हैं और स्वर्ण एक बार फिर से हमारे ह्र्दय और हमारे बटुवे में अपना स्थान सुनिश्चित कर चुका है।

3 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (28-10-2017) को
"ज़िन्दगी इक खूबसूरत ख़्वाब है" (चर्चा अंक 2771)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar ने कहा…

जानकारी से भरा लेख

कोपल कोकास ने कहा…

धन्यवाद ओंकार जी

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