मेरे मोहल्ले में रमज़ान

इनायत विला में ‘’रमजान’’ के दिनों में इफ्तारी के समय मैं हर शाम इफ्तारी के लिये नबाब अंकल के यहाँ जाया करती थी । भले ही मैं रोजे नहीं रखती थी पर मैं वहाँ इफ्तारी के लिए ज़रुर जाती थी । मैं वहाँ खूब सजधजकर जाती थी ,मेरी मम्मी मुझसे पूछती थी कि कहाँ जा रही हो तो मैं कहती थी कि वहीं जहाँ रोज जाती हूँ । फिर मै वहाँ पहुँच जाती थी वहाँ पर जैसे सबके लिये वहाँ बैठने की इंतजाम होता था वैसे मेरे लिये भी विशेष तौर पर होता था । मेरी जगह हमेशा नबा अंकल के पास ही होती थी क्योंकि वे मुझे बहुत चाहते है ।जि दिनों रोजे होते थे उस दिन मेरी तीनो भाभियाँ आंसमा भाभी,नाजनी भाभी,बुशरा भाभी मेरी आंटी और नानी सुबह चार बजे से उठकर सहरी के लिए पकवान बनाने की तैयारी में लग जाती थी पकवान बनने के बाद सब नमाज पढ़ते उसके बाद सब खा पीकर या तो उसी समय सो जाते थे उसी समय अपने काम करने लगते थे मेरे तीनो भाई तो तुरंत सो जाते थे । आंटी व नानी व भाभियाँ तो अपने काम में लग जाते थे और सबके सो जाने के बाद नबाब अंकल अपने काम में लग जाते ,वे कुछ पढ़ते या अपने पेड़ों में पानी डालते या कुछ और करते पर उनका यह नियम आज भी कायम है कि वे अब भी सुबह चार बजे उठते है उन्हे सुबह आठ बजे आँफिस जाना होता था उन्हें पूरा दिन काम करना होता है इसलिए वे ज़्यादा रोजे नहीं रखते थे वे कुछ खास रोजे ही रखते थे । सुबह आठ बजे से आंटी उनकी आँफिस जाने की तैयारी में लग जाती क्योंकि अंकल रोजे नहीं रखते थे इसलिए घर में उनके लिए खाने व उनके टिफिन में ले जाने के लिए खाना बनता था । साढ़े आठ बजे अंकल की आँफिस की गाड़ी अंकल को लेने आ जाती थी और अंकल अपने आँफिस के लिए निकल जाते थे । फिर शाम को कभी कभी वे जल्दी आ जाते थे कभी उन्हे देरी हो जाती थी पर वे ये कोशिश करते थे इफ्तारी की आज़ान होने से पहले घर पहँच जाऊँ । अंकल के जाने के बाद सब मिलजुलकर घर की साफ सफाई करते अपने अन्य काम करते काम समाप्त होने के बाद दिन में कुछ देर भाभियाँ आंटी व नानी थोड़ी देर के लिए टीवी देखते फिर कुछ देर के लिए सो जाते । मेरे भैया लोगों की हालत शाम तक जबाब दे देती थी वे पानी पानी गुहार लगातें रहते थे पर नियम तो नियम है भई नियम तो सबके लिए एक समान है । फिर शाम को चार बजे से मेरी तीनो भाभियाँ आंसमा भाभी, नाजनीन भाभी बुशरा भाभी मेरी आंटी और नानी मिलकर इफ्तारी के लिए ढेर सारे पकवान बनाने की तैयारी में लग जाते थे । उसके बाद सबके घर नाश्ता भेजने का क्रम चलता था । वहाँ की एक चीज मुझे बहुत पसन्द है, मीठा ब्रेड जिसे ‘’शाही टुकडा‘’ कहते हैं उसका रंग नारंगी होता है उसमें रंग के लिए जलेबी रंग ड़ाला जाता हैं यह बहुत ही मीठा होता है । इसे मीठा बनाने के लिए उसमें शक्कर बहुत भारी मात्रा में मिलायी जाती है यह मुझे बहुत अच्छा लगता है । और भी कई चीजें बनती थी जैसे कीमे का समोसा यह समोसा कीमे को मिलाकर बनाया जाता है यह नमकीन होता है पर बहुत की लज़ीज होता है ,पोहा, इडली साभंर, कस्टर्ड,गुलगुला जो कददू और आटे,ग़ुड़ या शक्कर को मिलाकर बनता है ,चावल के आटे का चिला अगर कभी कुछ ना बन पाता तो कभी कोई फल खाया जाता या खजूर तो रहता ही था । मै रोज अपनी सहेली डौली के साथ बातें करने जाती उसके घर जाती थी । तो रोज मैं नबाब अंकल के घर जा नहीं पाती थी पर नबाब अंकल मेरे लिए इफ्तारी का नाश्ता ज़रुर अलग से रखते थे क्योंकि उन्हे पता है कि मैं ज़रुर आऊंगी खाने के लिए ना सही पर उनसे मिलने के लिए ज़रुर आऊंगी व सबसे कह देते थे कि भई उसके हिस्से का नाश्ता अलग रखो वो आयेगी तो ज़रुर खायेगी । वो एक ऐसा घर है जिसमें आज भी मैं बेहिचक कुछ भी मांगकर खा सकती हूँ ।

आप सभी को रमज़ान मुबारक -कोपल